बूंद बूंद से सागर बनता
पल पल क्षण क्षण समय चलता
क्षण भंगुरता में निश्चितता से
सृष्टि का व्यापार है चलता ।
जगत की इस सुन्दरता से
चीजों में नूतनता आती
परिवर्तन के क्रमिक प्रवाह से
चहुंदिश सुन्दरता छा जाती ।
दिनकर का डूबना फिर उगना
फूलों का खिलना मुरझाना
नीर में बुलबुलों का बनना
रंग बिरंगी आभा दिखलाना ।
क्षण क्षण बनना क्षण क्षण मिटना
बन बन कर फिर मिटते जाना
न्यारे न्यारे दृश्य बनाना
झट सबके मन प्राण हर्षाना ।
पूर्वांचल व्योम कैनवस पर
अरूणिमा का रंग बिखेरना
किरणों का छायांकन करना
क्षण भंगुरता सौंदर्य दिखाना ।
उदधि की लहरों का दौडना
दौड दौड उसमें छिप जाना
देख देख इसके क्षिप्र प्रवाह
सागर का कहकहे लगाना।
उजले काले मेघों का उमडना
पल पल अपना रूप बदलना
भांति भांति आकाार बनाना
रूई जैसे उडते रहना ।
क्षण भंगुरता बनी शाश्वतता
कायनात का निरन्तर विकास
इसी चाल से दुनिया चलती
बिना किसी के विशेष प्रयास ।
विद्या
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