• What is your middle name? Does it carry any special meaning/significance?

    मेरा कोई मिडिल नाम नहीं है

  • जीवन के झंझावातों से

    आते जाते आघातों से

    डरना नहीं न घबराना है

    दीप उम्मीद का जलाना है ।

    चाहे प्रलय क्यों न आ जाये

    आकाश टूट कर गिर जाय्

    उथल पुथल हो सारा संसार

    उम्मीद का दीप जला रह जाये ।

    इस दीप में है भीषण शक्ति

    पा सकती है अनंत में भक्ति

    घने निराशा भरे समय में

    रक्षा कर सकती लगाती युक्ति ।

    कुच कुच अंधियारा छा जाये

    ज्वालामुखी भले फट जाये

    कुदरत की विनाशलीला से

    धरा ये तहस नहस हो जाये ।

    नदी में डूब निकल जाना है

    पंकिल मार्ग से न घबराना है

    कांटे चुभते रहे पांवों में

    दीप उम्मीद का जला रखना है ।

    आशा पर आकाश टिका है

    संकट आना कहां रूका है

    जीवन के उतार चढाव में

    मन इस दीप पर ही टिका है ।

    विद्या

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  • What is the last thing you learned?

    जबतक जिन्दगी है सीखते ही रहना हैअभी अंतिम सीख कैसे बतायें ?

  • What is one question you hate to be asked? Explain.

    मैं परिवार के मतभेद से सम्बन्धित प्रश्नों से घृणा करती हूं ।

  • How has a failure, or apparent failure, set you up for later success?

    असफलता के क्षोभ से विवेक जागृत होता है और कुछ करने की अदम्य ईच्छा उत्पन्न होती है जिसके चलते मनुषय सफलता के शिखर पर चढ जाता है ।

  • पंचम में पिक फूटते, अमराई में रोज । 
    कभी मंद, फिर तीव्र में, रहे हृदयधन खोज ।। 

    मनमोहक ऋतु आ गयी, मनभावन मधुमास । 
    कली-कली है चाहती, भौरें आवे पास ।। 

    मधु ऋतु की दीवानगी, मधु में खोया ठौर। 
    आम्रडालियां झूमती, ले, ले, नूतन बौर।। 

    नव कोंपल उग देखते, धरती का श्रृंगार। 
    प्यारा मोहक दीखता, ये सारा संसार ।। 

    जूही बेला मोगरा, महमह करता बाग। 
    आया वसंत प्यार से, मन में गूंजे फाग ।। 

    पसर रही सखि चांदनी, गिरि वन उपवन गांव। 
    नदी-नदी पर डालती, धीमे-धीमे पांव ।। 

    चंदा आया दूर से, मिली-अकेली-रात । 
    शब्दहीन अनुगूंज में, खुली सुहानी बात।। 

    पूर्णचंद्र ले अंक में, सागर दौड़ा जाये। 
    लहर झकोरे जोर से, बहता पिघला आये।। 

    दिव्य पुलक में खोलती, भू के प्राण मरोर। 
    छलक चांद से चांदनी, फैली चारों ओर ।। 

    छलके जल कण गागरी, उछल उछल गिर जाय। 
    बूंद-बूंद विधु झांकता, अगनित छवि दिखलाय ।।

    विद्या

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  • पंचम में पिक फूटते, अमराई में रोज । 
    कभी मंद, फिर तीव्र में, रहे हृदयधन खोज ।। 

    मनमोहक ऋतु आ गयी, मनभावन मधुमास । 
    कली-कली है चाहती, भौरें आवे पास ।। 

    मधु ऋतु की दीवानगी, मधु में खोया ठौर। 
    आम्रडालियां झूमती, ले, ले, नूतन बौर।। 

    नव कोंपल उग देखते, धरती का श्रृंगार। 
    प्यारा मोहक दीखता, ये सारा संसार ।। 

    जूही बेला मोगरा, महमह करता बाग। 
    आया वसंत प्यार से, मन में गूंजे फाग ।। 

    पसर रही सखि चांदनी, गिरि वन उपवन गांव। 
    नदी-नदी पर डालती, धीमे-धीमे पांव ।। 

    चंदा आया दूर से, मिली-अकेली-रात । 
    शब्दहीन अनुगूंज में, खुली सुहानी बात।। 

    पूर्णचंद्र ले अंक में, सागर दौड़ा जाये। 
    लहर झकोरे जोर से, बहता पिघला आये।। 

    दिव्य पुलक में खोलती, भू के प्राण मरोर। 
    छलक चांद से चांदनी, फैली चारों ओर ।। 

    छलके जल कण गागरी, उछल उछल गिर जाय। 
    बूंद-बूंद विधु झांकता, अगनित छवि दिखलाय ।।

    विद्या

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  • कोयल कूकी अमराई

    तो कुहू कुहू का शोर उठा

    फागुन आया सिहराते

    इससे सबको पता चला ।

    धरती को सारे कण कण

    पर्यावरण का हर

    हर्षित हुआ है रोम रोम

    चमक उठा जैसे सोना।

    किसने बता दिया उसको

    ये ऋतु परिवर्तन की बात

    वनस्पतियां सुलग उठी हैं

    सब हो रहा अपने आप।

    रात रानी ,रजनी गंधा ,

    बेला ,गुलाब,कचनार

    खिल खिल कर फैला रहे

    चहुंदिश मीठी गंध अपार।

    काल क्षण के संगसंग

    बीज बढते जाते हैं

    बीज से पौधा फूल फल

    अनवरत उगते आते हैं ।

    मिट्टी की शक्ति अनोखी

    बीज डालो वही फल पाओ

    यहां जीवन बढता जाये

    स्वाद का आनंद उठाओ।

    आया फागुन पोर पोर

    सर सर सर सर हवा चली

    प्रेमी जन लगे घूमने

    अपने प्रियतम की गली ।

    विद्या

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  • देखा है मैंने उनको

    आंखों आंखों में हंसते

    मछली पालने की खुशी

    आपस में वितरित करते ।

    साथ साथ आते दोनों

    व्यतीत करते सुखद पल

    खाना पीना सोना सब

    पूरा हो जाता तट पर।

    पकड पकड मछली दोनों

    पुलकित होते रहते थे

    आज इतना माल पाया

    एक दूजे से कहते थे ।

    संतुष्ट आनंदित सभी

    स्नेह से भरा था जीवन

    देख देख जीती रहती

    सुन्दर स्फुरित स्पंदित क्षण ।

    दे दे मैं खुश होती थी

    उनके जीवन की आशा

    रिक्त हस्त होने पर अब

    छाई है घोर निराशा ।

    गदराये अपने यौवन

    पर इतराना इठलाना

    भूली बातें हो गईं

    उन्हें देख कर मुस्काना ।

    ऐसा लूटा लोगों ने

    सारे प्राणी खत्म हुए

    कंकड पत्थर भी सूखे

    तट घाट भी ध्वस्त हुए ।

    मछुआरे जोडी ने भी

    आना जाना है छोडा

    निराशा भरे भाव लिये

    अपनों का मुख है मोडा।

    ठूंठ सी बन गई हूं मैं

    नहीं रही सरस जलधार

    करती आशा भींगे दृग

    काश पुनःआये रसधार ।

    विद्या

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    वव्य