विध्वंस का अंत नहीं
नाहीं है कोई सीमा
कटे पेड सूखी नदियां
असंभव हो गया जीना ।
अवनि पुत्र दायित्व ले लो
हरियाली पूरी पसरे
गिरि भी अडिग रहे ऊपर
अनायास यूं ना ससरे ।
रसा का रस नहीं सूखे
छाती फटे नहीं इसकी
वंजर धरती व्याकुल हो
सहारा ले सके किसकी।
खेलो न पंचभूतों से
तेरे वश की बात नहीं
अगर संतुलन बिगडेगा
बचोगे तो कोई नहीं ।
प्रारंभ से ही ढो रही
दिव्य सृष्टि का संभार
लोभ द्वेष ईर्ष्या घमंड
ले करने लगे प्रहार।
सोचो अभी भी संभलो
रोको अपनी मनमानी
विनाश ही करने की क्या
तूने मन में है ठानी
विद्या
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