नाच

किसी एक क्षण में प्रभु ने

ब्रह्मांड को सजाया है

आकर्षण विकर्षण डाल

लट्टू जैसा नचाया है ।

लयवद्धता निरन्तरता

तारतम्यता के क्रम में

जड चेतन सब घूम रहें

लडी बद्ध हो धूरी पे।

दुनिया ये नाच रही है

महाकाल की थिरकन पर

पल छिन न रूकना इसको

कभी समताल के ऊपर।

सूरज,चांद ,तारे,गगन

सभी लगे हैं नर्तन में

धरती भी अपनी गति से

चलती जा रही इनमें ।

जन्म से मृत्यु पुनःर्जन्म

इसमें जीवन नाच रहा

चौरासी लाख योनी

में बार बार भटक रहा ।

पानी के बुलके समान

सब बन कर मिटते जाते

इस क्षणभंगुर संसार में

जुगनु सा जल बुझ जाते ।

इस अस्थिरता अनिश्चितता

बीच इतनी बडी आशा

लेकर हम जीते जाते

छोड कर सारी निराशा ।

विराट प्रकृति के छुद्र

अंश हम अहंकार भरे

सुकर्मों को छोड छाड कर

कुकर्मों में हैं लगे पडे ।

विद्या

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