प्यास

धरती प्यासी गगन है प्यासा

प्यासे हैं इस जग के लोग

अपनी अपनी प्यास लिये सब

करते हैं जीवन का भोग ।

कोई प्यासा कुंदन का है

कोई प्यासा चंदन का

कोई प्यासा शक्ति का है

कोई प्यासा भक्ति का ।

कलियों को है प्यास किरण की

चकोर चांद का प्यासा है

भौरों को है प्यास कुसुम की

सीपी को स्वाति की आशा है ।

प्रेम के प्यासे रीत गये हैं

काम के प्यासे हैं सब लोग

श्रदधा की नदी सूख गई है

ईर्ष्या करती अपना भोग ।

कोई पीता घूंट घूंट कर

कोई निगलना चाहता है

घूंट घूंट कर निगल निगल कर

पीते हैं ,पर प्यासे लोग ।

विद्या

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