कान्हा तेरा नर्तन मंगलकारी है
दानव नहीं मानव की हितकारी है
फन पर नर्तन कर यमुना स्वच्छ किया
मोहिनी रूप में अमृत कलश बचाया।
पडे जब संकट में औघडदानी शंकर
नर्तन कर तूने भस्मासुर से बचाया
असल में नटवर तो तुम्ही हो मोहन
सोलह कलाओं से पूर्ण परमेश्वर हो।
तुम्हारी ईच्छा से धरा गगन नाच रहा
सकल पिंड नाच रहे अपनी धूरी पर
जीवों का क्या कहना उनकी हस्ती नहीं
चौरासी लाख योनी में उन्हें नचाते हो ।
मन को मोहने में भी अति पारंगत हो
जो भी देखता है मोहित हो जाता है
सुदर्शन चक्र जैसा चक्कर चलाते हो
नृत्य की निपुणता से विस्मित करते हो ।
सुखद है कोमलता ये कुशलता नाथ
नयनों की भंगिमाएं ह्रदय छेदती हैं
गोपियों संग लास्य में संगीत है भरा
इसी के ताल पर सृष्टि नाच रही है
विद्या
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