मानवता

हम बैठे हैं बारूद के टीले पर

हमीं ने जमा किये हैं बारूद

सभ्यता के नाम पर

हम सभ्य हो गये हैं

अब जंगली नहीं हैं क्योंकि

हम रहते हैं लोहे और सीमेन्ट

के बने जंगलों में ।

प्रकृति से प्रगति करते करते

आज बारूद के ढेर पर बैठ

हम मानवता के भविष्य के लिये

चिंतित भी हैं ,इसीलिये करते हैं

पृथ्वी सम्मेलन या निरस्त्रीकरण की बात

मानवता के विनाश की सारी सामग्री जुटा

हम मानवता की रक्षा हेतु सभाएं करते हैं।

हमारा ऐसा करना हमारी नियति है

भविष्य के अंधकार से अनजान

हमलोग मानवता की डाल को

मानवता की कुल्हाडी से काटते जाते हैं

हमारी विनाश लीला सतत जारी है ।

विद्या

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