ये चट्टानें चिनकती जा रही हैं
लहरों में लहराती जा रही हैं
जैसे टूटा हो अरमां किसी का
वैसे ही हहराती जा रही हैं ।
हर वूंद में भरी पडी व्याकुलता
पल भर न रूका जा रहा है
पंच भूतों का असंतुलित रूप
उछालते फलांगते जा रहा है।
हडबडी है इसकी प्रबल गति में
मानों उत्सव कोई छूटा जा रहा है
बर्बाद होने की ऐसी हडबडी
कभीना देखा या सुना गया है ।
सोचा ना समझा देखा ना भाला
अपने ही हाथों नष्ट कर डाला
सजाया जिसको स्वतः प्रकृति ने
लावण्य छीना है उसका तूने ।
यूं धूम मचाया धरती गगन में
पतझड फैलाया खिलते चमन में
अगर जल स्तर इसी तरह बढेगा
प्रलय आगमन कैसे रूकेगा ।
विद्या
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