वर्फ की पुकार

ये चट्टानें चिनकती जा रही हैं

लहरों में लहराती जा रही हैं

जैसे टूटा हो अरमां किसी का

वैसे ही हहराती जा रही हैं।

हर बूंद में भरी पडी व्याकुलता

पल भर भी ना रूका जा रहा है

पंच भूत असंतुलित होकर

उछलते फलांगते जा रहा है ।

हडबडी है इसकी प्रबल गति में

मानों उत्सव कोई छूटा जा रहा है

बर्बाद होने की ऐसी जल्दी

कभी ना देखा या सुना गया है ।

सजाया जिसको स्वतःप्रकृति ने

लावण्य उसका नष्ट हो रहा है

पर्यावरण का नाश करके

प्रलय को न्योता जा रहा है

विद्या

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