सागर की पुकार

अन्तरतम का अन्तर्द्वन्द ले

लहरें विशाल आती हैं

सागर के मन की बातें

ये बतलाना चाहती हैं ।

सदियों से चला आ रहा

सृष्टि का सहयोगी बन

मानव दुश्मन बन रहा

डाल रहा है विष के कण ।

कामना पूर्ण न होगी

करले जितना भी दोहन

जहर भरेगा सागर में

नहीं बचेगा जन जीवन ।

जलचर जीवों के प्राणों

को संकट में डालोगे

नभचर थलचर को भी तुम

बचा तो नहीं पाओगे ।

अपविष्ट डालकर सागर

को दूषित करने वालों

अपने उपद्रवी कर्मों से

खंड प्रलय लाने वालों ।

समुद्र की उदारता का

यूं ना दुरूपयोग करो

संभलो अभी भी समय है

तुम संयमित उपयोग करो ।

विद्या

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