मनहर दो दो तटों बीच
कलकल छलछल बहती थी
नील गगन समक्ष हिमालय
प्रसन्न मुख हंसती थी ।
नैसर्गिक सौंदर्य लिये
इतराती बलखाती थी
लघु लघु लहरों में बह कर
वूंदों को उछलाती थी ।
छीना है सलोना रूप
वन उजाडने वालों ने
पर्वत काट सदन बनाने
उसमें रहने वालों ने ।
जल भांडार लूटा गया
निर्जल सूखी बांध बनी
सुकोमल आकृति खोकर
मानों मैं कंकाल बनी ।
रचा बसा सरस जिन्दगी
खोकर ठूंठ बनी हूं मैं
कितने जीवित जीवों की
खुली मजार बनी हूं मैं।
पुनःसलिल भर दो मुझमें
जल क्रीडा करने वालों
जल ही जीवन का ज्ञापन
हरपल छपवाने वालों ।
रोको रोको रोक सको
तो होगा सबका उद्धार
सरस जिन्दगी छायेगी
फिर छा जायेगी बहार ।
विद्या
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