चार धाम यात्रा
लेखिका —डॉ विद्या रानी
आचार्य एवं पूर्व अध्यक्ष
हिन्दी विभाग ति.मा.भा.वि.वि.
भागलपुर।
1
चारो धाम यात्रा
यात्रा संस्मरण
लेखिका
डॉ विद्या रानी
अवकाश प्राप्त आचार्य
एवं पूर्व अध्यक्ष हिन्दी
विभाग तिलका मांझी विश्व विद्यालय भागलपुर
२०२२ साल मेरे लिये उपलब्धियों से भरा साल रहा ।ये बात अलग हुई कि मेरा निवास स्थान बदल गया।24.12.2021 को ही मैं भागलपुर छोड कर अपने पति और सास
के साथ वंगलोर चली आई ।मेरी छोटी बहू ऋतिका दुबारा मां बनने वाली थी ।उसी उपलक्ष्य में यह निर्णय हुआथा कि हमलोग यहीं रहेंगे ।14 जनवरी 2022को ऋतिका एवं वैभव को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई एक पुत्री दित्या छे साल की हो गई थी इसतरह इस साल उन लोगों का परिवार पूरा हो गया।अस्पताल घर के चक्कर के साथ साथ कोरोना का चक्कर भी चला और उससे भी ज्यादा वैभव बाबू का यू एस जाने का चक्कर ।पूरा साल उथल पुथल लगा रहा ।पुत्र जन्म के 15 दिन बाद वैभव यू एस चले गये और साल भर एक दो बार आते जाते 8 दिसम्बर को सपरिवार ही वहां चले गये।ये मेरे परिवार के लिये एक अच्छी उपलब्धि हुई हम लोग आनंदित हुए ।इन घटनाओं के अतिरिक्त एक बहुत बडी बात ये हुई कि हम लोगों ने चारो धाम की यात्रा की ।इस यात्रा का श्रेय सर्वप्रथम तो भगवान को जाता है उसके बाद मेरे बच्चों को ।छोटी बेटी ऋचा एवं मेहमान अमृतांशु ने चारो धाम यात्रा का कार्यक्रम बनाया था ।उन लोगों ने हम पति पत्नी को भी कहा कि “आप लोग भी चलिये ।”हम दोनों पैंसठ से लेकर पचहत्तर के बीच के हैंऔर दोनों ब्लड प्रैसर ,हार्ट ,स्लिप डिस्क,आर्थराइटिस जैसे अनेक बीमारियों से ग्रसित हैं।मैंने तो एक ही बार में कह दिया कि मुझे नहीं जाना है ।अगर तुम्हारे पापा को जाना है तो ले जाओ ।मैं अपने शारीरिक कष्ट से परिचित थी इस कारण जाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी ऋचा सपरिवार जा रही थी दोनों बच्चे शिवम ,परम ,अमृतांशु समधिन सुनैना जी सभी।पतिदेव तो दोनों हाथ पैर से तैयार थे उनको जाना ही जाना था पर अकेले नहीं।
ये संकोच था कि अकेले जायेंगे तो बाद में झगडा करेगी ।जबतक मैं नहीं जाने की धुन पर थी तब तक चारोंबच्चों को वेचैनी थी कि किसी तरह मां पापा चले जायें।मेरा चिंतन चल रहा था हां नहीं हां नहीं विचार करते करते एक बात कौंधी कि मैं जाने से डर क्युं रही हूं ?दर्द के डर से या जान जाने के डर से?तो दर्द तो बैठे बैठे भी होता ही है और मरना निश्चित है जहां होना होगा वहीं होगा तो इसका क्या डर ?इस प्रकार तीन चार दिन के उथल पुथल के बाद मन स्थिर हुआ कि वैभव बाबू अभी यहीं हैं नव जात शिशु जीवु को देखने केलिये मेड वगैरह है ही नौ दस दिन की यात्रा है चले जाते हैं ।
इस प्रकार कुल सात जन की टोली बनी तीन सिनियर सिटीजन मैं मेरे पति और समधिन दो बच्चे शिवम परम बेटी ऋचा मेहमान अमृतांशु ।9मई2022से 20मई2022तक की यात्रा तय हुई ।अभी जाने में पन्द्रह बीस दिन की देर थी ।यात्रा में पहनने के लिये कपडों की तैयारी प्रारंभ हुई।
2.
चारो धाम यात्रा ——और आगे
श्रुति ,ऋचा,ऋतिका सबने मिल करकरीब दस ग्यारह सूट स्कर्ट ,गंजी,फैशन का सामान,पेस्ट ,ब्रश,दवाई सब खरीद दिया ।पतिदेव के लिये भी सारा सामान लिया गया ।इतनी बडी यात्रा और इतने डैमेज लोग इसीलिये यात्रा की तैयारी जोर शोर से होने लगी ।ऋचा और अमृतांशु की हिम्मत को दाद देनी चाहिये कि तीन बूढे और दो बच्चों को साथ ले इतनी कठिन यात्रा पर निकल पडे थे।
ऋतिका एवं वैभव ने एक बॉक्स में हम दोनों का सामान जमा दिया और अलग सेकुछ नमकीन मीठा एक बैग में दे दिया ।यात्रा के दिन हम लोग एयर पोर्ट पर ही मिले ।वैभव हम लोगों को गाडी से पहुंचा आया था ।जाने समय भी ऋतिका कह रही थी कि मां मुझे डर लग रहा है आपलोग अच्छे से आ जाइयेगा ।एयर पोर्ट पर सबके चेहरे पर यात्रा का उल्लास दीख रहा था मेरा मन अंदर से दुबका हुआ था अपने डर को सहलाते हुए समझा रहा था कि घबराइये नहीं हमलोग शुभ शुभ लौट आयेंगे।
यात्रा का क्रम भी अनोखा था ।वंगलोर से देहरादून विमान से वहां से हरिद्वार कार से फिर वहां के एक बडे होटल में विश्राम करना था।जिस कम्पनी से टिकट कटा था उसी की गाडी एयरपोर्ट पर आई थी सात जन के लिये दो गाडी ।मई का महीना था धूप बडी तेज थी करीब बारह एक बजे का समय था ।उसी धूप में गरम गाडी के अंदर हम लोग बैठ गये ।अभी गाडी चलती ही कि एयर पोर्ट के वाहन यूनियन का लीडर हाथ भांजते हुए आया और हमारी गाडी को रोकने लगा ।उसका कहना था कि ये पैसेन्जर हमारे हैंअगर बाहरी कम्पनी की गाडी आयेगी तो हमलोगों के रोजगार का क्या होगा ?करीब आधे घंटे के बक झक के बाद अमृतांशु नेट्रैफिक एजेन्सी के मालिक से अपनी कम्पनी के मालिक की बात करवाई बहुत बहस होने के बाद मामला शांत हुआ इधर हमलोग गर्मी से बेहाल थे लग रहा था कब गाडी चले सबकुछ सलटने के बाद गाडी चली हमलोगों ने राहत की सांस ली ठंडा पिया भगवान को धन्यवाद दिया ।हमलोग बिलकुल बिल्ली के बच्चे की तरह अपने को ऋचा अमृतांशु पर छोड दियेथे
कहां रहना ,सोना,खाना,कब तैयार होना सब पूछ पूछ कर करते थे ।उसदिन जब होटल का कमरा मिला तो हमलोगों को आराम मिला ।होटल वाले ने बताया कि कल सुबह होटल के परिसर से ही हेलिकॉप्टर जायेगा बद्री नाथ केदार नाथ इसीलिये कल सुबह पांच बजे ही तैयार रहना है कुछ थोडे आवश्यक सामान लेकर ।
3.चारो धाम यात्रा ——-आगे
होटल बडा था तीन कमरे बुक किये गये थेएक में हम लोग दूसरे
में ऋचा लोग और तीसरे में समधिन शिवम परम ।कमरा मिल जाने के बाद हमलोग एक ही कमरे में जुटे वहीं कुछ स्नैक्स वगैरह मंगवाया गया चाय पी गई ।कमरे में दो बडे बडे बेड दो सोफा और कुछ प्लास्टिक की कुर्सियां थीं ।हमलोग सातो जन आराम से बैठ गये थे ।संध्या होने में
देर थी विचार हुआ था कि संध्या वेला में होटल के पीछे चल कर देखा जायेगा कि हेलिकॉप्टर कहां है और वेटर ने बताया था यहां संध्या आरती भी होती है तो वो भी देखा जायेगा ।
शाम मेंमेरे जाने के लिये ह्वील चेयर की व्यवस्था की गई चूंकि मैं 90से ही स्लिपडिस्क ,आर्थराइटिस ,ब्लडप्रैसर की पेशेन्ट रही हूं पांच मिनट भी खडा नहीं रहा जाता है ।तो सबलोग पीछे मैदान की तरफ बढे शिवम मेरा चेयर लेकर चल रहा था कुछ उबड खाबड जगह पर होटल के स्टाफ लोगों का सहारा ले लिया जाता था थोडी दूर ऋचा ले गई ।वहां पहुंच कर देखा कि हरी घास से भरा हुआ बडा सा मैदान था और उसके बाद गंगा की धारा थी जहां पर हम लोगों के लिये हाई टी की व्यवस्था थी उसके सामने सोलह सीट वाला हेलिकॉपटर था उसकी सफाई और मरम्मत में कुछ लोग लगे हुए थे ।
एक तरफ गंगा के किनारे मैनेजमेंट के लोग पूजा अर्चना गंगा आरती में लगे हुए थे बाकी लोग वहां किनारे तक गये आरती देखने के लिये मैं और समधिन शेड के नीचे रहे जहां चाय मिल रही थी।बडा मनोरम दृश्य था सूर्यास्त हो चुका था पर अंधकार का साम्राज्य नहीं फैला था ।गोधूलि वेला की रोशनी में कुछ दीप आरती उतार पहे थे मैं प्रसन्न थी कि गंगा आरती में होने वाली भीड से बची रही और गंगा आरती दर्शन भी हो गया।एक तरफ सूर्यास्त की लालिमा दूसरीतरफ फैला हुआ बडा सा मैदान एकदम हरा भरा उस बीच हमलोग चाय की चुस्की ले रहे थे मन कर रहा था कि काश इसी जगह घर होता तो कितना मजा आता ।ट्रैभल एजेन्सी की कार्य शैली बहुत अच्छी थी समय से पहले ही बता दिया गया कि जाना कब है कितना वेट लेकर जाना है ।पता चला कि हर व्यक्ति सात किलो से अधिक वेट नहीं ले जा सकता है । वहीं मैदान में पता चला कि रात के खाने की व्यवस्था दूसरी मंजिल पर है वहां आठ बजे तक पहुंच कर खाना खा लेना है बाद में नहीं मिल पायेगा ।चूकिं पांच बजे सुबह निकलना है इसी लिये ।
4 .
oचारो धाम यात्रा ——-हम लोग भोजन वाली जगह चले पता चलने पर कि सीढी चढना है ऋचा ने कहा मैं देख के आती हूं तुम नहीं चढ पाओगी तो तुम्हारा खाना कमरे मेंही पहुंचवा दूंगी ।मैं वहीं एक चबूतरे पर बैठ गई ।पता चला कि बिना रेलिंग की सीढी है मैं नहीं जा सकती तो सब लोगों को ऊपर डायनिंग टेबुल पर बिठा कर ऋचा आई और कहा चलो मैं तुम्हें तुम्हारे कमरे में पहुंचा देती हूं वहीं खाना भिजवा दूंगी ।मैं छडी के सहारे ऋचा का हाथ पकड कर कमरे की ओर चली ।वहां पहुंच कर बाहर ही बैठना पडा क्योंकि चाभी इनके पास रह गईथी ।बाहर वरामदे पर बैठी थी कि सामने का दरबाजा खुला एक अधेड उम्र की महिला निकली और कहा कि आप अंदर आ जाइये ।मैं उनके कमरे में चली गई ।उनके कमरे का वातावरण घर जैसा था वो कुछ साग बना रही थी शायद उनकी बेटी मैनेजमेंट में काम करती थी ।उन्होंने बताया किमैं अपनी पसन्द का खाना खाती हूं मेरी बेटी भी यही पसन्द करती है ।उसने चाय के लिये पूछा मैंने मना कर दिया ।कुछ इधर उधर की बातें होने लगी दस पन्द्रह मिनट बाद शिवम चाभी लेकर आया और मैं उनको धन्यवाद देकर अपने कमरे में चली आई।करीब एक घंटे बाद भोजन आया सबलोग खाना खाकर आ गये थे ऋचा बच्चों और मेरे कमरे की व्यवस्था देखने लगी सबका विस्तर ठीक ठाक लग जाये सुबह सबको सात किलो सामान ही ले जाना है इसी लिये सबका कपडा एक ही बैग में ले लेना है बर्फीला प्रदेश में गर्म कपडे ही ज्यादा जरूरी था ।
शिवम परम का कमरा मेरे कमरे से नजदीक था ऋचा का दूर इसीलिये उसको दौड दौड कर आना पड रहा था ।सारी तैयारी करते करते ग्यारह बज गये जल्दी सोना है जल्दी सोना है कहते कहते हम लोगों को देर हो ही गई ।कल हेलिकॉप्टर से केदार नाथ बद्री नाथ जाना है यह सोच सोच कर मन उद्वेलित था एक तरफ जाने का उल्लास और दूसरी तरफ पहाड की चोटियों के बीच से हेलिकॉप्टर के गुजरने की भयावहता से प्राणों का डर सब मंथन कर रहे थे ।इस मंथन में भगवान विष्णु एवं भगवान शंकर दोनों की प्रार्थना चल रही थी कि हे भगवान आये हैं तो सुरक्षित यात्रा संपन्न हो जाये
5.सुबह चार बजे ही हमलोग उठ गये उठे क्या नींद तो रात भर नहीं आईथी निश्चिंत वाली वो एजेन्सी का निर्देश कि सुबह पांच बजे पहुंचना है ज्यादा वेचैन किये हुए था ।कमरे का बाथरूम अच्छा बडा था ,गर्म पानी की सुविधा भी थी पर बाथरूम में स्नान करने के लिये कुछ स्टूल कुर्सी वगैरह नहीं थी इससे मुझे परेशानी हुई हैंड शावर से किसी तरह स्नानकर कपडे लपेट कर चली आई ।यहां से सूट और स्कर्ट धारण कर लिया गया क्योंकि यात्रा के लिये ये वस्त्र ही लिये गये थे।
हम दोनों शीघ्र ही नहा धोकर तैयार हो गये दवा स्वेटर शॉल सबके साथ छडी लेकर बाहर निकली वहां वहीलचेयर परमानेंट मेरे लिये रखा हुआ था मैं बैठ गई स्टाफ मुझे ले चलने लगा सबने अपने अपने ऊनी कपडे भी चेयर पर डाल दिये थे ।मैदान पहुंच कर देखा कि अभी सब लोग नहीं आये हैं हमलोग सात जन ही ईमानदारी से पहुंच गये हैं ।सामने सोलह सीट वाला हेलिकॉप्टरपंखी हिला हिला कर तैयारी कर रहाथा ।होटलमैनेजमेंट वाली लडकी भी आ गई ढेरों निर्देश दिये बताया कि शॉल वगैरह लपेट कर रखना होगा अन्यथा दुर्घटना का डर रहता है ।मैं उनके निर्देश को ध्यान से सुन रही थी । उसका हूबहू पालन करना सोच रही थी करीब आधे घंटे तक चाय पीने एवं इंतजार करने के बाद पूरे ड्रैस में पॉयलट और उनको सहयोगी प्रगट हुए
धीरे धीरे सारे यात्री आ गये थे ।सबलोगों को हेलिकॉप्टर पर सवार होने के लिये बुलाया जाने लगा हमलोग इंतजार कर ही रहे थे आगे बढे लोग फटाफट चढने लगे मैं तो साक्षात लंगडी हूं मुझे सबसे बाद में चढाया जाने लगा
ऋचा और दो आदमी की सहायता से मैं चढ पाई सोचने लगी कि इसी कारण मैं आना नहीं चाह रही थी इतनी परेशानी हो रही है सबको मेरेलिये रूकना पड रहा है ।ऋचा को लग गया था कि मां डर गई है इसीलिये वो मेरे पास आकर बैठ गई हाथ पकड कर पूछा “डर लग रहा है मां “मै क्या बोलती डर तो लग रहा था पर मैं बोली नहीं डर नहीं लग रहा है सिर्फ चढने में परेशानी हुई है ।
पॉयलट के चढने के बाद उसके सहयोगी ने सीढी और स्टूल सब रख कर दरवाजा बंद कर लिया ।कुछ निर्देश दिये कि अभी हमलोग यहां से छब्बीस किलोमीटर गुप्त काशी हैली पैड जा रहे हैं वहां इस हेलिकॉप्टर को छोड दिया जायेगा वहां से छे सीट वाले हेलिकॉप्टर से केदार नाथ जाया जायेगा ।इस सोलह सीट वाले को तो हम देख चुके थे अब छे सीट वाली बात डरा रही थी ।मेरा मन प्रभु स्मरण में लगा हुआ था सारे यात्रियों की स्थिति कमोवेश मेरी वाली ही थी ।चोटियों के संकीर्ण मार्ग पर चलते हुए सहयोगी ने बताया कि हमलोग किस किस मार्ग से जा रहे हैं चारो तरफ पहाड की चोटियां ही चोटियां थी उसी के वीच से हेलिकॉप्टर निकल रहा था ।मैं थोडी थोडी देर में समधिन से बात कर लेती थी राम राम करके करीब डेढ घंटे में हम लोग गुप्तकाशी पहुंच गये।गुप्तकाशी का हेलीपैड एक बडा सा मैदान था चारो तरफ ऊंचे ऊंचे पहाड से घिरा हुआ ।उसी मैदान के एक छोर पर एक होटल था और गेस्ट हाउस की तरह ढेर सारे कमरे लाइन से बने हुए थे ।पता चला कि मौसम खराब होने के कारण यात्रियों को यहां रूकवाया जाता है क्यों कि छोटा हेलि कॉप्टर बादलों की धुंध के कारण जा नहीं पाता है ।
हमारा हेलिकॉप्टर एक तरफ रख दिया गया था निर्देश हुआ कि कम से कम सामान लेकर जाया जायेगा क्योंकि छोटे हेलिकॉप्टर में ज्यादा वजन नहीं जा सकता था ।हम लोग जो सात किलो लाये थे वो भी उसी हेलि कॉप्टर में छोड कर उस फुलवारी की कुर्सी पर आ जमें ।उस लॉन में हम सोलह लोग के अलावे और भी लोग थे जो दूसरे साधन से आये हुए थे ।चाय मंगवाई गई शिवम परम को स्नैक्स के लिये ले जाया गया ।अब छोटे हेलि कॉप्टर का इंतजार हो रहा था ।आठ बजे से ग्यारह बजे तक एक दो बार हेलिकॉप्टर का चक्कर लगा हम लोगों का नं बाद में था बारह बजे पता चला कि छे आदमी का वेट ढाई क्विंटल से ज्यादा नहीं होना चाहिये ।यात्रियों का वेट ले ले कर ढाई क्विंटल वजन बना बना कर भेजा जा रहा था ।ऐसा संयोग हुआ कि पतिदेव 90किलो और परमबाबू 30किलो मिल कर एक ग्रुप के वेट को पूरा कर रहे थे तो चार दूसरे लोगों के साथ ये दोनों नाना नाती फिट हो गये और बाबा केदार नाथ धाम की ओर चले गये ।अब हम पांच बच गये थे सबसे सिनियर नाना जी और सबसे जूनियर परम बाबू को बाबा पहले बुला लिये हम लोग गुप्त काशी में राम राम करते रहे।
अब एक चिन्ता और बढ गई कि ये दोनों वहां ठंड में कहां और कैसे होंगे ।क्षण क्षण फोन करके पूछा जाने लगा कि वहां का क्या हाल है ?इतने में पता चला कि मौसम खराब होने के कारण अब मार्ग बंद हो गया है ।ढाई बज गये थे सुबह नौ बजे से चाय पी पी कर थे
iकि पूजा करके खायेंगे पर जब रास्ता खुलने का कोई चांस नहीं देख अमृतांशु ने प्रपोजल रखा कि इतनी देर हो गई है जाने का कोई मार्ग नहीं दीख रहा है तो चलिये पहले भोजन कर लिया जाय।जब मार्ग खुलेगा तब जाया जायेगा ।भूख तो सबको लगी ही थी ये बात सबको पसन्द आई हमलोग फुलवारी छोड कर होटल चले ।वहां हमलोगों ने रोटी ,चावल ,दाल,सब्जी ,पापड ,भुजिया ,दही सब कुछ खाया ।बाहर आने के बाद पता चला कि मार्ग खुल गया सबलोग हेलि पैड की ओर दौडे एक हेलि कॉप्टर आया था हेलि पैड तक पहुंचते पहुंचते फिर खबर आई कि मार्ग बंद हो गया हार कर सबको फिर फुलवारी में आना पडा।
चार धाम यात्रा ———आगे
thioसुबह से तीन बजे तक एक कुर्सी पर बैठे बैठे मैं बहुत थक गई थी मैंने ऋचा से कहा कि कोई कमरा खुलवाओ मैं लेटना चाहती हूं बहुत खुशामद के बाद कमरा खुला मैं अपने स्टिक के सहारे चलते हुए कमरे में पहुंची वहां जाकर लेट गई ।ऋचा और समधिन ने भी कमर सीधी की ।मैं मन ही मन बाबा केदार नाथ से प्रार्थना कर रही थी कि क्या गलती हो गई भगवन इनको और परम को तो बुला लिया और हम लोगों को यहीं छोड दिया है पता नहीं कब जा पायेंगे ।संयोग से अभी आधा घंटा भी आराम नहीं हो पाया था कि फिर हल्ला हुआ मार्ग खुल गया खुल गया हम लोग हडबडा कर हेली पैड की ओर लपके ।हम पांच जन के साथ एक अजनबी अपने वजन के हिसाब से फिट हुए थे वे अकेले ही इस यात्रा में निकले थे छे आदमी पूरे हुए हेलिकॉप्टर स्टार्ट ही रखा गया था पंखी चल रही थी लोग शोर मचा रहे थे जल्दी आइये जल्दी आइये बाकी लोग आगे पहुंच गये मैं पीछे रह गई स्टिक के अलावे दो आदमी दोनों तरफ से पकड कर मुझे ले जाने लगे लगभग घसीटते हुए लग रहा था कि ऑटो पर बकरियों को ठूंसा जा रहा हो ।सबसे पीछे मुझे हेलिकॉप्टर में धकेला गया उसके तुरत बाद गेट बंद कर दिया गया जबतक मैं संभल कर बैठती कि हेलिकॉप्टर उड चला ।मैं थरथराते हुए धडकते दिल से उडने लगी ।छोटा सा खिलौने जैसा वाहन और चारो ओर पहाड की चोटियां ही चोटियां नीचे फैली हुई हरियाली उसके बीच से निकलते हमलोग ।शिवम दिखा रहा था कि नीचे देखो नानी कैसी जगह है ? मैं कहीं देखना नहीं चाहती थी किसी तरह सांस रोके दुर्गा दु्र्गा जपते हुए जा
जा रही थी ।
एक संतोष तो था कि इंतजार खत्म हुआ अब हम सब भी बाबा केदार नाथ धाम पहुंच जायेंगे ।कुछ ही मिनटों में हमारा वाहन केदार नाथ धाम के हेलि पैड पर पहुंच गया जब वहां लैंड किया तो वहां भी वही हडबडी उतरो उतरो उतरो कह कर हमें उतारा गया और करीब करीब घसीटते हुए उस स्थान से दूर ले जाया गया क्योंकि हेलिकॉप्टर स्टार्ट ही रखा गया था यहां से गुप्त काशी लौटने वालों को चढाने के लिये ।वहां हेली पैड पर स्थिर होने के बाद जब मैनें पहाडी मार्ग देखा तो कांप गई
कि कैसे जाऊंगी इस ऊबड खाबड मार्ग पर?
चारो तरफ नजर दौडाई तो उस समस्या का समाधान दिख गया ।वहां पर अनेक लोग अपनी वेंत की कुर्सियां ले ले कर खडे खडे ग्राहकों का इंतजार कर रहे थे ।उनको पिट्ठु कहा जा रहा था ।हेलिपैड से मंदिर करीब आधा किलो मीटर था ।
तय हुआ कि सिनियर सिटीजन लोग पैदल नहीं जा सकेंगे इसीलिये उनके लिये पिट्ठु की व्यवस्था की जाये ।बाकी लोग पैदल चलें ।ये पिट्ठु वहां के पहाडी लोग थे हट्टे कट्टे गोरे नाटे मजबूत ।ये वेंत की बनी सोफानुमा डोलची पर यात्रियों को बिठा कर पीठ पर लाद कर मंदिर तक पहुंचाते थे ।मोल भाव होने के बाद तीन पिट्ठु को बुलाया गया हम तीनों बूढे लोग उसपर सवार होने के लिये आगे बढे।उन लोगों ने बारी बारी से एक सीढी के ऊपर डोलची रख कर हम लोगों को बिठाया और दूसरी तरफ लगे चौडी पट्टी के सहारे उठा कर पीठ पर लाद लिया पट्टी उनके सिर से लगी थी।
पहाडी मार्ग ऊबड खाबड चौडी चौडी सीढियां उस पर यात्रियों की भीड में से रास्ता निकालते हुए ये चल रहे थे मेरा एक ओर सिर लटक रहा था दूसरी तरफ पैर गर्दन और ठेहुना दोनों जगह पीडा हो रही थी बीच बीच में कोई तीसरा आदमी पैर पकड लेता था सबकी कमोवेश यही स्थिति थी ।हम लोगों को आने में बिलम्ब हो गया था इसीलिये इन नाना नाती को कह दिया गया था कि आप लोग दर्शन कर लें क्योंकि हम लोग पता नहीं दर्शन कर पायेंगे कि नहीं ।करीबचार बजे शाम को हमलोग मंदिर के पास पहुंचे ट्रैभल एजेन्सी के स्टाफ हमारे साथ थे और तीनों पिट्ठु भी।मंदिर बंद होने की तैयारी मेंथा यात्रियों की भीड नहीं थी पंडित लोग सफाई कर बाहर निकलने की तैयारी में थे ।हम लोगों के पहुंचने पर बाहर ही एक पंडित ने कहा कि
मंदिर बंद हो गया है अब शाम छे बजे खुलेगा ।स्टाफ ने कहा कि ये लोग वी आई पी हैं उसके बाद हमलोगों को अंदर जाने की अनुमति मिल गई ।मै अपनी छडी और दो पिट्ठुओं के सहारे मंदिर के अंदर की ऊंची ऊंची चौडी सीढियां पार करने लगी ।मन श्रद्धा एवं उल्लास से भर गया कि बाबा पास में बुला लिये ।मुख्य मंदिर के पहले एक कमरा था बडा सा ,जहां और सब मूर्तियां थीं उसकी दहलीज भी ऊंची थी उसे पार करके देखा कि एक लडकी पूजन सामग्री समेट रही थी फिर उस कमरे को पार करने के बाद मुख्य मंदिर में हमारा प्रवेश हो गया ।अब केदारनाथ के गर्भ गृह में हम पांच लोग थे और पंडित जी एवं बाबा केदार नाथ
.का लिंग एक पसरे हुए अनगढ पत्थर का था लगता था कि किसी वृषभ की पीठ हो ।बचपन से सीखा था कि भोजन करके शिवलिंग का स्पर्श नहीं किया जाता है इसके बाबजूद बाबा के स्पर्श का लोभ नहीं छूटा था । मैंने एक तरफ छू कर प्रणाम कर लिया ऋचा लोगों ने भी अपनी अपनी श्रद्धानुसार पूजा अर्चना की ।उतनी दूर पिट्ठु पर आने के बाद भी मंदिर के अंदर पहुंचते पहुंचते मेरी सांस फूलने लगी थी कंठ बिलकुल सूख गया था मैं परेशान हो गई थी ।वहां मंदिर को धोने के लिये बाल्टी में जल रखा हुआ था मैंने पंडित से कहा कि थोडा पानी दे दो कंठ सूख गया है पता नहीं क्या हुआ पंडित जी ने अंजलि से जल लेकर मेरे हाथ में दे दिया और मै उसे पी गई।कंठ गीला हुआ जान में जान आई ऋचा सोच रही थी कि मां पूजा करने के लिये जल मांग रही है पर पीते देख कर अचंभित हो गई मुझे तो मानों धन ही मिल गया था ।
चार धाम यात्रा ——-आगे
इतने बडे मंदिर में सिर्फ मेरा परिवार ही था फिर भी सांस फूलने के डर से जल्दी से प्रणाम करके मैं वहां से पलटी दोनों पिट्ठु साथ ही थे उनकी सहायता से गर्भ गृह की ऊंची दहलीज को पार कर मैं बाहर वाले कमरे की दहलीज पर बैठ गई ।उसी कन्या से कहा कि पानी मिलेगा?उसने एक बोतल में पानी लाकर दिया मैं वहीं बैठ कर पानी पीने लगी ।इतनी देर में सारे लोग बाहर आ गये।सब प्रसन्न थे बहुत अच्छा दर्शन हुआ था ।मंदिर के बाहर वाले परिसर में ढेरों साधु संत बैठे थे एक बडा वाला पत्थर भी था जिससे वहां आई हुई बाढ से मंदिर की सुरक्षा हुई थी ।अजीबोगरीब वेश भूषा में संत जन अपना अपना आसन बिछा कर बैठे थे जादुई रूद्राक्ष ,अनेक तरह की माला ,रंग बिरंगे पत्थर सब की खरीद बिक्री हो रही थी । लग रहा था कि इस क्षण को संजो कर रख लें कुछ देर और यहां पर ठहर जायें किन्तु लौटने की हडबडी थी जल्दी जल्दी हेलिपैड पहुंचना था जिससे समय रहते वापस गुप्त काशी पहुंच जायें ।
10.पिट्ठू लोगों ने फिर हमलोगों को पीठ पर लादा और वापस हेली पैड की ओर चले कार्यक्रम था कि हमलोग वापस गुप्त काशी पहुंच कर वद्री धाम जायेंगे और वहीं विश्राम करेंगे। पर बाबा की मर्जी कुछ और थी हेलिपैड तक पहुंचते पहुंचते वर्षा शुरू
हो गई झमा झम वाली नहीं टिप टिप वाली ।सारे यात्री समूह छिपने की जगह ढूंढने लगे ।एक बडा सा यात्री निवास था जिसमें ताला लगा हुआ था उसके छज्जे के किनारे कुछ कुर्सियां थी उसी पर हमलोग किसी तरह बैठ
गये कि हेलिकॉप्टर आयेगा तो हम लोग जायेंगे गुप्त काशी ।पर इधर वर्षा तेज होने लगी और उधर घाटी का मार्ग भी बंद हो गया ।मार्ग में घने बादल घिर आये हेलिकॉप्टर गुप्त काशी से लौट ही नहीं पाया ।करीब छे बजे शाम तक हमलोगों ने इंतजार किया ये निर्णय लेने में देर हुई कि अभी जाना है या यहीं रहना है ।इस निर्णय में ईश्वर ने सहायता पहुंचाई वर्षा तेज होने लगी ।
वर्षा होने के कारण ठंड बहुत बढ गई थी पिट्ठुओं ने बताया कि यहां चाय मिल रही है तो अमृतांशु ने कहा कि सबको चाय लाकर पिला दो वे लोग दौड कर भींगते भींगते गये और चाय लेकर आगये ।चायपीने से हम लोगों को थोडा अच्छा लगा ।अब क्या किया जाय ये विचार हो ही रहा था कि वर्षा इतनी तेज हो गई कि छज्जे के नीचे बचना मुश्किल हो गया अब फिर पिट्ठुओं से कहा गया कि हम लोगों को ऊपर बने टेंट में पहुंचा दें ।बाकी लोग तो दौड कर ऊपर बने टेंट में पहुंच गये हम लोग बाद में पीठ पर लदे लदे ऊपर पहुंच गये ।संयोग से वहां एक कुर्सी थी मैं उस पर बैठ गई बाकी लोग नीचे बिछे प्लास्टिक के गद्दे पर बैठ गये ।सब लोग ठंड से सिकुड रहे थे अमृतांशु ने देखा कि बगल वाले टेंट में गरमागरम मैगी बिक रहा है उसने सबके लिये मैगी का आर्डर दे दिया ।अब बारी बारी से सबके लिये मैगी आने लगा और हम लोग खाने लगे ।
चार धाम यात्रा ——-आगे
वहीं हेलिपैड पर जब हम लोग इंतजार कर रहे थे मेरी सांस बहुत फूल रही थी संयोग से एक व्यक्ति सफेद कपडे में आया और ऑक्सीजन का एक डिब्बा ऋचा को लाकर दिया ।ऋचा ने पूछा कि मैं इसका क्या करूंगी?तो उसने कहा कि इस माता जी की सांस फूल रही है इसमें ऑक्सीजन है इनको दीजियेगा मेरा काम हो गया अब मैं लौट जाऊंगा ।हम लोगों को एक और आइडिया हुआ कि ऑक्सीजन लेने से कुछ आराम होता है अब मैं बार बार ऑक्सीजन लेने लगी थी ।एजेन्सी वाले को ये मानने में देर लगी कि हम लोगों को केदार नाथ में ही रूकना पडेगा ।जब अमृतांशु बिगडा कि पानी में भींग रहे हैं हमलोग जाने का कोई ठिकाना नहीं है तो यहीं ठहरने की व्यवस्था करो नहीं तो हम लोग क्या करेंगे? जब तय हुआ कि यहीं के होटल में ठहरना है तब होटल की खोज प्रारंभ हुई ।एक होटल का नाम आया फिर पता चला कि वो भर गया है फिर दूसरे होटल का नाम आया भोला होटल अब वहां जाने के लिये हम लोगों को फिर से पिट्ठू की सवारी करनी पडी यानी एक ही मार्ग को पार करने के लिये हमें चार बार पिट्ठू को पैसे देने पडे ।पिट्ठू पर चढने का एक नया अनुभव था ऊपर गर्दन लटकती थी नीचे पांव ।पीठ पर लदे लदे भी मेरी सांस फूल रही थी लगता था कि जल्दी जल्दी उतार दे ढोने वाले को तो आदत थी वो सहज ही था ।करीब बीस पच्चीस मिनट के बाद उन्होंने हम तीनों को भोला होटल के वरामदे पर उतारा हम लोगों ने चैन की सांस ली पिट्ठुओं को पैसे देने के बाद हमलोग अपने कमरे की ओर बढे जो बुक करवाया गया था ।एक कमरा नीचे और एक ऊपर मिला था तय हुआ कि अमृतांशु शिवम परम एवं उस अजनवी के साथ ऊपर वाले कमरें मेंजायेंगे और बाकी हम लोग नीचे वाले कमरे में ।
नीचे का कमरा अच्छा खासा बडा था उसमें दो डबल बेड का पलंग गद्दा रजाई सबके साथ रखा हुआ था पूरे दीवार से दीवार कर कालीन बिछा हुआ था कमरे के आखिरी छोर पर बडा सा बाथरूम था जिसमें ठंडा गरमपानी की व्यवस्था थी दो चार कुर्सियां भी थीं दूसरी तरफ दीवार पर कुछ आलमारी भी बने हुए थे सामान रखने के लिये ।एक लम्बे वरामदे पर लाइन से ढेर सारे कमरे थे और बाहर वरामदे पर खाने के लिये टेबुल और बेंच रखे हुए थे मौसम खराब होने की वजह से भीषण भीड थी ।हम लोग कमरे केअंदर जाकर बहुत राहत महसूस कर रहे थे
शाम से ही भींगनें के कारण परेशान थे जल्दी ही बेड की रजाई में घुस गये ।दरवाजा बंद कर लिया गया ।अब चाय की तलब जगी इच्छा हुई कि वहीं बेड पर ही चाय पिया जाये
वहां चाय का आर्डर कर दिया गया आर्डर स्वीकार तो कर लिया पर इस हिदायत के साथ कि चाय बाहर आकर पीना पडेगा कमरे में चाय पीने की अनुमति नहीं है ।बर्फीला प्रदेश है कमरे के अंदर खाने पीने से गंदगी फैलेगी कीडे मकौडे के आने का डर है अगर सफाई होगी तो सूखेगा कैसे? बेमन से हम लोगों ने वरामदे में जाकर चाय पी ली और हडबडा कर कमरे में आ गये ।ठंडा एक दो डिग्री ही था हमारे कपडे आधे भींगे हुए थे ।रजाई के नीचे गर्म होने की कोशिश कर रहे थे ।वर्षा होने के कारण भीड बढ गई थी पूरा वरामदा खचाखच भरा हुआ था खाने के टेबुल से आधा वरामदा ढका हुआ था बाकी आधे वरामदे में तीन तीन पंक्ति में लोग खडे थे ।कमरे के अंदर हमलोग अपने को भाग्य शाली समझ रहे थे ।
चार धाम यात्रा ———-आगे
बाहर वाले लोग भी झांक झांक कर हम लोगों को देख रहे थे।कंबल के अंदर हम लोगों के हाथ पांव जकड रहे थे पतिदेव तो करवट लेने की स्थिति में नहीं थे उनको गरम करने के लिये ऋचा अनेक उपाय करने लगी ।पहले तो भींगा मोजा उतार कर पांव पोछ कर नया मोजा पहनाया फिर चारो तरफ से तकिया लगा कर उनको गरम करने की कोशिश करने लगी ।थोडी देर में उनके शरीर की थरथराहट कम हुई और स्थिर हुए।उधर ऊपर वाले कमरे में सब व्यवस्था करके अमृतांशु नीचे आया और भोजन के जुगाड में लग गया ।बहुत भीड थी पूरा टेबुल भरा हुआ था और भोजन के इंतजार में तीन तीन पंक्तियों में लोग खडे थे।अमृतांशु ने अपने आदमी को लगाया कि टेबुल खाली होते ही लूट लो नहीं तो बहुत बिलम्ब हो जायेगा ।हम सब कंबल में बैठे रहे टेबुल लूट कर जब दरवाजा खटखटाया गया तो हम लोग लपक कर बाहर निकले और सामने वाले टेबुल पर बैठ गये।सात जन थे एक तरफ चार दूसरी तरफ तीन बैठे वैसे तीन के बैठने की ही जगह थी पर परम दुबला पतला था किसी तरह दुबक कर बैठ गया ।खाना जो भी मिल रहा था रोटी दाल सब्जी एकदम साधारण पर एकदम गरम ।वेटर दौड दौड कर सब टेबुल पर पहुंचा रहाथा ।मुझे अचंभा हो रहा था कि इतने टेबुल पर इतने लोगों को एक ही समय गरम गरम रोटियां कैसे मिल रही हैं।जरूर कोई बडी व्यवस्था है और इतनी भीड कैसे ?
पता चला कि वहां की कैपेसिटी से तीन गुना ज्यादा लोग रूके हुए हैं वर्षा के कारण इसीलिये सब चीज की तंगी हो गई है ।दो या तीन डिग्री ठंड में हम लोग खा रहे थे और कांप रहे थे ।परम तो एकदम नींद में सो गया था उठ कर जो आया तो पूरा कांप रहा था ।किसी तरह कोशिश करने के बाद उसको खिलाया जा सका ।हम लोग सब दो दो रोटी खा कर कमरे में घुस गये।परम शिवम अपने पापा के साथ सोने के लिये ऊपर वाले कमरे में चला गया ।अमृतांशु उन लोगों को सुला करफिर नीचे आया और ऋचा के साथ बाहर निकल कर मार्केट से दस्ताना ,मोटा कंबल ,मफलर,शॉल सब जो जैसा जिस कीमत पर मिला खरीद लाया।चूंकि हम लोगों का सारा ऊनी कपडा नीचे हेलिकॉटर में ही रह गया था इसी लिये ये खरीदारी करनी पडी।
12.गुप्त काशी की खिली खिली धूप में करीब पांच छे घंटे बैठने के बाद शिवम परम अपनी मां को चिढा रहा था कि यहां इतनी गर्मी है और तुम और ऊनी कपडा लेने बोल रही थी लो अब इन कपडों को तुम्हीं रखो ।सब बोले कि ऊनी कपडों को वहीं हेलिकॉटर में रहने दो ।अभी जो कपडे ला ला कर पहनाया गया तब उन लोगों ने मम्मी पापा को थैक्यू बोला गरम कपडे पहनाने के लिये ।
ग्यारह बजे रात तक इन लोगों ने मारकेटिंग की सामान भी खत्म हो गया था बाजार में सारा वातावरण शांत हो गया था ये दोनों फिर से मंदिर के पास जाकर दर्शन किये हम बूढे लोग तो कंबल से तभी निकले जब नेचुरल कॉल पर जाना पडा।बारह एक बजे तक सब सेटल करके सोने गये किसी तरह कुलबुलाते कुलबुलाते नींद तो आ गई ।सुबह बाथरूम में गरम पानी की व्यवस्था होने के कारण फ्रैश होने में कठिनाई नहीं हुई हम लोग चाय पी ही रहे थे कि एजेन्ट आ गया कि हेलिकॉप्टर आ रहा है जल्दी जल्दी चलिये ।हमलोगों ने उसको भी चाय पिलाया फिर पिटठुओं का इंत जार करने लगे क्यों कि उनके बिना तो हमलोग जा नहीं सकते थे ।
हेलि पैड पर पिट्ठुओं ने हमलोगों को उतारा ।हम लोग हेलिकॉप्टर का इंतजार करने लगे ।एक हेलिकॉपटर आया हम सब चढने के लिये आगे बढे पर दूसरे छे लोग चढ गये ।सुबह का समय था सूर्योदय हो चुका था साफसाफ नीले आकाश का रंग दीख रहा था ।एजेन्ट ने सतर्क किया कि अबकि बार जल्दी जल्दी सब चढेंगे ।सब लोग सावधान मुद्रा में और मैं ह्वील चेयर पर थी दूसरी बार जैसे ही हेलि कॉप्टर आया सब लोग तो अपने से चढे मुझे दो आदमी दोनों तरफ से घसीट करले गये और हेलि कॉप्टर में ढूंस दिया ।रात भर ठंड से सिकुडते हुए कटी थी आर्थराइटिस के कारण ठेहुना का दर्द बढा हुआ था इसतरह झटका खा कर चढने के कारण पूरा शरीर झनझना रहा था।स्थिर होने में पांच मिनट लगा और उसके पूर्व ही हेलिकॉप्टर उड चला ।जितने लोग आये थे उतने ही लौट रहे थे पहाडों के बीच से गुजरते हुए पूर्व की ही भांति मैं किसी ओर देख नहीं पा रही थी ।लगता था कि जि धर देखूंगी उधर ही गिर जाऊंगी ।सबसे किनारे वाली सीट पर मैं बैठी थी मन हीमन दुर्गा का जाप चल रहा था आंख स्थिर ,मुंह बंद आवाज नहीं निकल रही थी ऐसी स्थिति में एक सुकून ये भी था कि ये वाहन मिल गया अब यात्रा में कोई व्यवधान नहीं होगा ।
जीवन की उलझन में हम प्रभु स्मरण भूल जाते हैं पर जब प्राणों पर संकट आता है तो उनके अलावा कोई सहारा नहीं मिलता है ।मुझे स्मरण है कि उस बीस मिनट की यात्रा में एक क्षण के लिये भी दुर्गा नाम नहीं छूटा ।चारो तरफ बिखरा सौंदर्य कहीं से भी आकर्षित नही कर रहे थे।उससे ज्यादा तो गुप्त काशी में इंतजार करते समय चारो तरफ के पहाड उनके बीच से आते हेलिकॉप्टर ,पार्क में लदे रंग बिरंगे गुलाब ,हरी घास ज्यादा आकर्षित कर रहे थे ।
13.कहानी सुनी थी कि किसी व्यक्ति को एक बोरी हीरा दिया गया शर्तये रखी गई कि इन हीरों को अपने सिर पर उठा कर पैदल जाना होगा जितना हीरा लेकर जितनी दूर जायेंगे उतना हीरा आपका हो जायेगा।हीरे के भार से वो व्यक्ति इतना थक गया कि उसने हीरे उतारे और प्राण रक्षा के लिये गुहार करने लगा।तो सबसे महत्व पूर्ण अपनी जान ही है ये समझ में आने लगा ।गुप्त काशी में उतरवे के बाद वही हडबडी थी।सब लोग उतर कर हेलिकाटर की ओर भागे मैं सबसे पीछे उतरी ।मुझे उतार कर कुछ दूर घसीट कर भी ले जाया गया क्योंकि चलते हेलिकॉप्टर की पंखी की हवा से गिर जाने का भी डर था ।
गुप्त काशी में उतरने के बाद एजेन्ट ने बताया कि अपना सिक्सटीन सीटर हेलिकॉप्टर तैयार है सारे लोग बैठ गये हैं सिर्फ हमलोग बचे हैं उसी मैदान के एकछोर पर हमारा वाहन खडा
था ।मेरे लिये ह्वील चेयर आया और एक स्टॉफ ने दौडते हुए मुझे हेलिकॉप्टर तक पहुंचाया ।
चार धाम यात्रा ———आगे
हेलिपैड के ऊबड खाबड जमीन पर ह्वील चेयर पर धक्के खाते हुए मै हेलिकॉप्टर तक पहुंची ।उसमें नियम सा बन गया था कि
मुझे सबसे बाद में चढाया जाता थाऔर उतारा भी जाता था ।सबसे आगे वाली सीट मेरी थी शारीरिक रूप से अशक्त होने के बाद भी बच्चों की कृपा से मैं इस यात्रा में सहभागी बनी थी ।ईश्वर की भी मर्जी थी ।इस हेलिकॉप्टर में हम लोगों ने अपने सारे ऊनी वस्त्र प्राप्त कर लिये ।अब कल रात खरीदे गये ऊनी कपडे बोझ से लग रहे थे ।
पॉयलट के सहयोगी ने बताया कि अब हम लोग यहां यानी गुप्त काशी से वद्री नाथ धाम जायेंगे वहां जाने में कुल डेढ से दो घंटे का समय लगेगा वहां होटल में स्नान ध्यान करके मंदिर जाना होगा ।मैं फिर इस बडे वाले वाहन में सबसे आगे बैठ कर पूजा करने लगी ।यद्यपि इस वाहन में राहत थी अंदर जगह भी बडी थी और उतना डर नहीं लग रहा था ।ऋचा मेरे ही पास बैठती थी उसे पता था कि मां डरेगी वो मेरा हाथ पकड कर इधर उधर की बातें कह कर बहला रही थी ।
मुझे याद आया इसका बचपन जब ये तीन चार साल की होगी तब एक दिन उसने कहा था कि “मम्मी जब मैं बडी हो जाऊंगी तब मैं मम्मी बन जा ऊंगी और तुम झन्नो बन जाओगी “मैने कहा था कि “ठीक है तुम मम्मी बन जाना “।आज मैंने कहा कि झुन आज तुम मम्मी बन गई और मैं झन्नो ।इस बात पर दोनों खूब प्रसन्न हुए ।
समधिन को भी परेशानी थी पांव में दर्द रहता है और डायविटीज से भी परेशान रहती हैं पर वो मुझसे ठीक हैं वो भी मेरा ख्याल रखती थी।हम लोग बचपन में एक ही स्कूल में पढते थे छठी कक्षा में बचपन की सहेली अब सम्बन्धी भी बन गये हैं।अमृतांशु का ध्यान तो सबपर था किसको कब क्या चाहिये इसका ध्यान रख रहा था ।कहा जाय तो ये दोनों पति पत्नी तीन बूढों दो बच्चों को लेकर चल रहे थे ।कहां की बुकिंग है कैसे जाना है कहां रूकना है सारा कुछ उन लोगों के ऊपर ही था हम लोग शरीर से तो लाचार थे ही दिमाग को भी विश्राम दे रखा था ।सिर्फ इतना कि जो कहा जायेगा सो कर लेना है।
14.अमृतांशु की व्यवस्था ऐसी थी कि कहीं भी हमलोगों को किसी कठिनाई का सामना नहीं करना पडा ।करीब पन्द्रह दिनों की यात्रा में एक दिन भी ऐसा नहीं रहा जब हम लोगों को सोचना पडा कि आज रात कहां सोयेंगे ।हर बार हम लोग एक से बढकर एक चकाचक एकदम ग्रैंड जगह पर ठहरना हुआ था ।
करीब दस बज कर तीस मिनट पर हमारा वाहन बद्री धाम के हेलि पैड पर पहुंच गया था ।वहां हम लोगों को होटल ले जाने के लिये गाडियां लगी हुई थी ।उतरने के बाद हेलिकॉप्टर की पंखी से उडने वाली धूल के कारण पूरा धूल का गुबार सा फैल गया था इतनी तेज हवा थी कि हमलोग गिरते गिरते बचे शिवम मुझे पकड कर एक तरफ ले गया जल्दी से गाडी का दरवाजा खुलवा कर अंदर बैठा दिया ।इससे उबरने के बाद मैंने विष्णु भगवान को प्रणाम किया कहां से कहां आपने बुला लिया भगवन मैं तो सोच भी नहीं सकती थी कि यहां आ सकूंगी ।मन गदगद हो रहा था ह्रदय अनुग्रहित इतने दिनों तक पूजा करने का ये फल मिला कि इस धाम के दर्शन हो रहे हैं ।बद्री धाम की सडकें भी चौडी चौडी साफ सुथरी थीं पूरा शहर ही मानो बसा हुआ था ऊंचे ऊंचे मकान दूकान होटल सबकुछ ।कल्पना में जैसा धाम था उससे बिलकुल अलग।कल्पना में केदार धाम की तरह पहाडी पथरीला धाम था पर यहां तो एकदम अलग दृश्य था ।करीब तीस मिनट में हमारी गाडी एक आलिशान होटल के सामने ठहरी पता चला कि एजेन्टों ने हम लोगों के लिये यहीं कमरा बुक करवा के रखा है जहां से फ्रैश होकर हमें मंदिर जाना है ।सफेद रंग की दीवार ऊंची ऊंची खिडकियां दरवाजे कुछ सीढियां पार करने के बाद अंदर घुसते ही बडा सा हॉल जिसके बीचों बीच एक मूर्ति रखी हुई थी ।दोनों तरफ शानदार बडा बडा सा शोफा रखा हुआ था ।यात्री गण उन्ही शोफों पर
टिके हुए थे जबतक मैनेजर नाम पता नोट कर रहा था ।मैं भी एक हाथ में छडी और दूसरे हाथ से नाती का हाथ थामे लंगडाते लंगडाते एक शोफा पर जा धंसी ।होटल की भव्यता अभि भूत कर रही थी ।बर्फानी बाबा केदार नाथ के ऊबड खाबड धाम के बाद विष्णु भगवान के बैकुंठ धाम की कल्पना साकार हो रही थी ।यहां आकर हम सब प्रफुल्लित थे ।कुछ देर बाद कहा गया कि हम लोग कमरे की तरफ चलें जल्दी ही स्नान करना है ।
15.चारधाम यात्रा ——-आगे
मैं फिर उठी शिवम ने तत्परता सेआगे आकर मेरा हाथ पकड लिया थोडी दूर आगे जाने के बाद दाहिने मुडना था वहां देखा तो लाइन से कमरे थे सभी सुविधाओं से लैस करीब पांच छे कमरे पार करने के बाद फिर दाहिने घूमना था इस तरफ तीन कमरे के बाद चौथा पांचवां छठा कमरा हमलोगों के लिये बुक था ।हम दोनों को चौथे कमरे मे ठहराया गया।बडा सा कमरा बीचोंबीच डबल बेड एक तरफ सोफा अटैच बाथरूम अत्याधुनिक ताम झाम बहुत अच्छी प्रकाश की व्यवस्था और तो और बेड के बीचों बीच एक हीटर पैड लगा हुआ था जैसा कि अस्पताल में होता है उसमे लगे स्विच की मदद से ऑन ऑफ किया जा सकता था ।अमृतांशु ने चाय का आर्डर कर दिया सब लोग अपनेअपने कमरे में चाय पीने लगे इस ताकीद के साथ तैयार होना है जल्दी मंदिर जाने के लिये ।पतिदेव चाय पीकर बेड पर लेट गये कहा कि पहले तुम नहाओ ।मैंने अपना कपडा निकालना शुरू किया ही था कि ऋचा आ गई और कहा मैं निकाल देती हूं ।उसने मेरे और इनके कपडे निकाले पहले से पहने कपडों के लिए एक अलग बैग बना दिया बताया कि खुले कपडे इसी बैग में रखना क्यों कि भींगाना नहीं है ।तबतक परम अपनी मां को ढूंढता आ गया कि चलो मेरे कपडे दो ।ऋचा ने कहा तुम लोग तैयार हो जाओ मै जाती हूं।
मैंने बाथरूम देखा सबकुछ तो ठीक था पर बैठ कर नहाने की सुविधा नहीं थी ।जबसे पांव से लाचार हुई हूं तबसे मेरे दिमाग में एक बात आती है कि दुनिया में हर बाथ रूम में नहाने के लिए एक कुर्सी अवश्य होनी चाहिये।मैं स्टूल या मचिया पर नहीं बैठ सकती हूं ।टूथपेस्टब्रश लेकर मैने कमरे की कुर्सी पर ही बैठ कर ब्रश किया और तौलिया लेकर स्नान करने गई।जितनी देर खडी रह सकती थी उतनी ही देर में झटपट हैंड शावर के गरम पानी से स्नान करके बाहर आ गई।कपडे पहनकर कंघी ,चोटी ,क्रीम ,पाउडर,टिकली ,विन्दी ,सिन्दूर सब करके मैंने नी कैप एक बगल में रख दिया कि झुन आयेगी तो पहना देगी ।आय एम रेडी कह कर पतिदेव को नहाने का इशारा किया वो भी जल्द ही तैयार हो गये ।अब हमलोग सबलोगों का इंतजार करने लगे ।हमारे दिमाग में था कि मंदिर दर्शन के बाद भोजन होगा ।पर सबके तैयार होते होते इतनी देर हो गई कि होटल में सुबह का नाश्ता जो कमप्ली मेंट्री था यानी निःशुल्क उसका समय खत्म होने लगा था ।एक वेटर ने आकर बताया कि चल कर नाश्ता कर लें नहीं तो समय समाप्त हो जायेगा उसके बाद दर्शन करने चलेंगे ।मेरी सारी भक्ति धरी रह गई सोचने लगी कि घर पर ही ठीक से पूजा हो पाती है इतनी बडी जगह इतना बडा धाम और हमलोग खा पीकर पूजा करेंगे !पर उपाय क्या था ।समधिन सुनैना जी आकर बैठ गईं कि चलिये सब लोग चले गये हमींलोग सबसे बाद में हैं ।ऋचा आई मुझे नी कैप पहनाया समेटे हुए सामान को फिर से चेक किया कि मैंने अपनी आदत के अनुसार इघर उघर रख तो नहीं दिया है फिर बोली कि चलो फास्ट फास्ट नाश्ता का काउंटर बन्द हो जायेगा तो परेशानी होगी।सबलोग चले मैं जितना फास्ट चल सकती थी उतना चली करीब डेढ दो सौ कदम चलने केबाद होटल का केंटीन आया ।साढे ग्यारह बजे के पहले हमलोग कैंटीन में प्रवेश कर गये ।जैसा कि स्टार होटलों में होता है वैसा ही इस थ्री स्टार होटल सरोवर में था ।ब्रैडवटर से लेकर डोसा इडली तक ,पोहा से लेकर आलूपराठा तक,चाय कॉफी तरह तरह केशरबत,अनेक प्रकार के फल मिठाई, जूस यानी क्या कुछ नहीं था।जो इच्छा हो खाइये मेरे लिये मेरी पसंद का आलूपराठा और दही आगया कुछ स्नैक्स भी थे । सबने जम कर नाश्ता किया हमलोगों के बाद भी कुछ लोग आये व्यवस्था तो थी ही ।हम और समधिन एक साथ बैठ कर खा रहे थे दोनों एक दूसरे की रूचि का ख्याल रख रहे थे जो कुछ अच्छा लगता एक दूसरे को खिलाते कि देखिये ये खाइये ये अच्छा है।
16.पूरा नाश्ता करने के बाद हमलोग बाहर निकले ।रिसेप्सन हॉल के सोफे पर बैठ कर गाडी का इंतजार करने लगे ।थोडी ही देर मेंगाडी आ गई हम सब चले।मंदिर चूंकि ऊंचाई पर है इसीलिये गाडी कुछ दूर ठहरी।वहीं ढेरों लोग पिट्ठू बनने के लिये खडे थे।उनके हाथ में बेंत की साजी जैसा कुछ था।पता चला कि ये अशक्त यात्रियों को पीठ पर लाद कर मंदिर तक पहुंचाते हैं वही केदार नाथ धाम की तरह।हम तीनों को उसकी जरूरत थी ही अमृतांशु ने तीन लोगों को बुलाया और मोल भाव करके हमलोगों को चढा दिया ।अब हमलोग तीनों पिट्ठू की पीठ पर लदे आकाश की ओर देखते हुए मंदिर की तरफ चले।
उस डोलची का ऊपरी हिस्सा गर्दन के पास गड रहा था सिर को लटकने से बचाने के लिये हाथ से सिर को पकडना पड रहा था दोनों पांव बिना किसी सहारे लटकने के कारण ठेहुना टपटपा रहा था इसके वावजूद नहीं चल पाने की लाचारी के सामने वो सुविधा जनक ही लग रहा था ।यहां पहाड के ये निवासी जो लोगों के ढोने के काम को ही अपनी आजीविका बनाते हैं उनकी ताकत पर आश्चर्य होता है ।करीब करीब एक क्विंटल से कुछ कम वजन को पीठ पर लाद कर ऊंची ऊंची सीढियां चढना और हांफना भी नहीं गजब एक मैं थी कि पीठ पर लदे हुए भी गर्दन और ठेहुना के दर्द से मरी जा रही थी ।इतनी तकलीफ में भी जो प्राकृतिक दृश्य दिखे वे मनोरम थे ।जैसे जैसे ऊपर जा रहे थे वैसे वैसे हहराती हुई धवल गंगा साफ साफ दीख रही थी।एकदम झक सफेद पानी में वेग के कारण इतने झाग उठ रहे थे कि सूर्य की बारह बजे वाली किरणें चांदी का आभास दे रहीं थी।मानों पिघलती हुई चांदी बह रही हो ।वहां पर अम्बानी द्वारा बनवाया हुआ भवन भी था ढेरों मकान दूकान सब ।हम लोग ऊपर चढते चढते सीढियों तक पहुंचे पिट्ठु हमें वहीं उतारने लगा ।पर एजेन्ट ने बताया कि नहीं अभी दस पन्द्रह सीढियां और हैं ऊपर मंदिर है तो फिर उन सीढियों को पार कर उन लोगों ने हमें उतारा ।बाकी लोग पैदल आ रहे थे ।हम लोग वीआई पी कोटि में थे तो हमें एक हॉल में ले जाकर बिठा दिया गया ।कहा गया कि भीड से अलग एक दूसरे मार्ग से हमें ले जाया जायेगा ।वैसे मंदिरों में वीआई पी वाला फंडा लोगों को ठगने के लिये ही होता है क्यों कि कुछ दूर तक एक अलग मार्ग से ले जाकर अंत में सबके साथ ही जाना पडता है तिरूपति में भी यही हाल था ।खैर कुछ देर बाद एक गुप्त मार्ग से हम सब गये फिर दस बारह सीढियों के पास जाकर खडे हो गये ।मंदिर से सटे हॉल में जाने के लिये सीढियां थीं उस पर सुन्दर कालीन बिछा हुआ था ।सीढी देख कर तो मेरा माथा ठनका पर कोई चारा नहीं था रेलिंग पकड कर बांया पैर ऊपर उठाते हुए मैं एक एक सीढी चढती गई।अब पहुंच गई हूं ये भाव मन में उल्लास भर रहा था ।यहां भी ऊपर चढ कर एक हॉल में पहुंची जहां पर अनेक पंडित लोग तरह तरह के कार्यक्रम कर रहे थे।वहां से बाहर निकल कर मंदिर के परिसर में आ गये मुख्य दरवाजे पर पहुंच कर सारे लोग एक हो गये कोई वी आई पी सी आई पी नहीं था ।एकदम बाबा वैद्य नाथ धाम जैसा दृश्य धक्कम धक्का ,ढेलम ढेली ,हाथ नीचे ऊपर करके लोग दर्शन हेतु जा रहे थे ।मुझे छडी लेकर तकलीफ से जाते देख कर एक कृपालु पंडित ने कहा कि तुम इधर से चलो मैं उनके साथ पीछे से परिक्रमा करके निकास द्वार की तरफ बढी ।निकास द्वार की तरफ से पंडित जी ने मुझे घुसाया वहां खडे पुलिस को इशारा करके कहा कि इनको दर्शन करवा दो ।वहां एक महिला पुलिस भी थी उसने मुझे आगे किया कि सामने से दर्शन कर लूं ।मेरी तो आंखें भी उतनी तेज नहीं हैं देखते देखते भगवान की मूर्ति दिखी उसके चारो ओर की सजावट ज्यादा दिखी ।साफ साफ मूर्ति बहुत कम ।धक्कम घुक्की तो चल ही रहा था उधर ठेहुना भी अंतिम सीमा तक दर्द करने लगा था ।कंठ सूख रहा था ऐसा कि पानी न मिला तो प्राण ही निकल जायेंगे ।सिपाहियों की इच्छा थी कि मैं अच्छे से दर्शन कर लूं थोडी देर ,पर मैं शारीरिक पीडा से बेचैन थी प्रणाम करके दरवाजे की तरफ लपकी और उस महिला सिपाही से कहा कि कि थोडा पानी पिला दो कंठ सूख रहा है ।उसने तत्परता से पानी का एक बोतल दिया जिसमें एक ग्लास जितना पानी होगा ।पानी पीकर कंठ कुछ ठीक हुआ सांस फूलना भी कम हुआ पर अब कोई मुझसे पूछे कि कैसे हैं बद्री विशाल तो ईमानदारी से कहूं कि मैं नहीं बता सकती हूं क्योंकि उतनी उथल पुथल में मैं बारीकी से देख ही नहीं पाई थी ।सिर्फ उनकी जो प्रतिमा मन में है वही सच्ची प्रतिमा है ।एक अदृश्य अलौकिक अद,भुत परम शक्ति जिसे शालिग्राम के काले पत्थर में बांध कर रखा गया था ।नर नारायण रूप की इस मूर्ति में संसार भर की चर अचर विभूतियां समाहित थीं।हर बार ऐसे दर्शनीय स्थल में मेरे साथ ऐसा हो जाता है कि मैं ध्यान से देख ही नहीं पाती हूं।ट्रांस में चली जाती हूं ।घर में प्रार्थना करते हुए जितना कुछ मांगती हूं ईश्वर से वो सब कुछ भूल जाती हूं।लगता है कि ईश्वर ने मेरे स्मृति पटल को गीले कपडे से पोंछ दिया हो ॥कुछ मांग नहीं पाती हूं कुछ बोल नहीं पाती हूं अपनी आत्मा को प्रभु के चरणों में समर्पित करके ठहर जाती हूं बस और वहां से निकलने के बाद याद आता है कि कुछ तो कहा नहीं परमेश्वर से !
कितना कुछ कहना था फिर उसी परिसर में बैठ कर सारी बातें कहती हूं।गर्भ गृह से निकलने के बाद बाहर एक पंडित जी थे जो सबको चंदन लगा रहे थे मैंने भी उनसे चंदन लगवाया और एक बडे से दानपेटी पर बैठ गई ।तमाम लोग आ जा रहे थे चंदन लगवा रहे थे भक्ति और श्रद्धा का व्यापार जोर शोर से चल रहा था ।मेरे साथ के सारे लोग दर्शन करके निकले टीका लगवाया फिर तय हुआ कि कुछ देर बैठा जाय ।मंदिर के परिसर में ही एक जगह मिल गई दो दूकान के बीच में वहांहम तीन जन बैठ सके मैं ,पतिदेव,समधिन ।बाकी सब लोग वहीं आ गये थोडी देर बैठ कर हम यात्रियों की आवाजाही देखते रहे।मन संतुष्ट था दर्शन हो गया इतनी कठिन यात्रा करके बद्रीधाम में बैठे हैं।इच्छा हो रही थी कि चीख चीख कर सारे लोगों को बता दूं कि देखो हम कहां बैठे हैं ।बद्री विशाल के धाम में बडी अच्छी धूप थी ठंड का नामो निशान नहीं था ।वहां के प्रसाद में चने की दाल और मिश्री वगैरह कुछ मिला था पीने को पानी मिल ही गया था ।उस जगह को छोड कर जाने का मन नहीं कर रहा था लेकिन सांसारिक व्यक्ति ढेर सारे बंधन एजेन्टों की हडबडी ,होटल ,हेलिकॉप्टर सबकी व्यवस्था देखते हुए चलना था ।बद्री विशाल को बारम्बार प्रणाम कर फिर आने की कामना के साथ वहां से चले।पर अब फिर क्या आयेंगे सत्तर वर्ष की आयु में पहली बार आये हैं अब दुबारा तो बैकुंठ गमन के बाद ही मिलन होगा ।लेकिन किया क्या जाय मन ही है भागेगा ,दौडेगा,कल्पना करेगा,ईच्छा धरेगा ,चुप न बैठेगा ।हे भगवान सब ठीक ठाक रखना फिर दर्शन देना की कामना के साथ हम लोग वो सीढियां उतरने लगे जो सार्वजनिक थीं जिस पर कालीन बिछा हुआ नहीं था ।जहां ढेरों भीड थी ।मन में ये भाव लेकर कि अब लोगों को अपनी यात्रा स्थलीबताते समय यहां का नाम भी आयेगा कि हम लोग बद्री धाम भी गये हैं।आठ दस सीढियां उतरने के बाद हम सब उसी स्थल पर पहुंचे जहां पर पिट्ठुओं ने हमें छोडा था ।वे लोगववहां उपस्थित थे ।मैं अपनी डोलची में बैठ गई ।उतना चढने उतरने में ही मेरी सांस फूल रही थी ।अब डोलची में राहत की सांस लेने लगी ।तीनों लोग पिट्ठु पर बैठ कर नीचे उतरने लगे।फिर वही मुद्रा शरीर उस डोलची में अटका हुआ पांव नीचे लटकता हुआ सिर को बिना किसी आधार के रखना था जिसे मैं बायें हाथ से पकड कर चल रही थी ।फिर वही दृश्य हहराती गंगा ,चमकीले पहाड ,रंग विरंगे घर , ऊंची ऊंची चोटियां सबकुछ जो अनंत काल से स्थिर हैं ज्यों के त्यों मानव की पीढियां आ रही हैं जा रही हैं और ये वैसे ही बने हुए हैं।
मेरा पिट्ठू आधे रास्ते में कुछ असहज होने लगा ।मैं ने पूछा क्या हुआ आपको परेशानी हो रही है तो कहीं रूक जाइये डोलची नीचे रख दीजिये ।उसने ऊंची जगह देख कर डोलची के साथ मुझे उतार कर रख दिया ।अपनी गर्दन सहलाने लगा।मुझे अजीब लग रहा था मैं अपनी अपंगता के कारण लाचार थी और वो अपनी जीविका के कारण ।थोडी ही देर में उसने मुझे उठाया और गंतव्य तक पहुंचा कर ही दम लिया ।वहां उतारते ही गहरी सांस ली और अपने दोस्तों से बोला “एह पूरा एक क्विंटल है ।”सब हंसने लगे ।मैंने कहा नहीं बेटा एक क्विंटल नहीं 86 किलो हूं पर किसी ने ध्यान नहीं दिया ।वैसे मेरे पति 96 किलो के हैं और समधिन 60 70 किलो होंगी पर लोथ और लटका हुआ शरीर होने के कारण मैं ही सबको वजनी दीखती थी।तीनों के लिये पिट्ठू लेने की जब बात होती थी तब सबसे पहले वो लोग समधिन को लूट लेता था हल्की जो थीं फिर पतिदेव को उसके बाद जो बचता था वो हार कर मेरे पास आता था ।वहां पर गाडियां लगी हुई थीं हम लोग बैठ गये बाकी लोग भी आ ही रहे थे ।सबके आने के बाद पिटठुओं को पैसा दिया गया मैंने उनकी निर्धारित पारिश्रमिक से दो दो सौ रूपया अधिक दिलवाया ।सोचा कि बहुत बडा काम किया है थोडा खुश हो जाये।पता चला कि अब हमें होटल में चलकर भोजन करना है और फिर विश्राम यहां से जाने वाला हेलिकॉप्टर चार बजे आयेगा ।वो एक क्विंटल की बात पर सबको खूब हंसी आ रही थी।गाडी से होटल जाने में मुश्किल से पन्द्रह मिनट लगता था होटल पहुंच कर सब लोग अपने अपने कमरे की ओर बढे ।
17.चार धाम यात्रा ————आगे
थोडा आराम करने की इच्छा थी पर जब होटल पहुंचे तो एक स्टाफ दौडा दौडा आया और उसने कहा कि भोजन तैयार हो चुका है आप लोग भोजन कर के विश्राम करें।करीब सौ कदम चलने के बाद कमरे में आई थी अब फिर चलना मुझे तो बडा भारी लग रहा था ।मैंने कहलवा दिया कि मेरा भोजन कमरे में ही भिजवा दो और फिर विस्तर पर लेट गई।गई तो थी पिट्ठुके पीठ पर ही पर उतार चढाव के झटके भीड भाड की धक्का मुक्की सबसे परेशान हो गई थी ।लग रहा था कोई न उठाये ।तीन चार घंटे सो लूं।लेटे हुए आधा घंटा ही हुआ था कि घंटी बजी पूछने पर कि क्या है जबाब मिला खाना ,तबतो उठना ही था वो भी मुझे ही क्यों कि पतिदेव तो नहीं उठते ।जाकर दरवाजा खोल दिया वेटर ने खाना सेन्टर टेबुल पर रख दिया मैं सोफे पर जा बैठी कि अब खा कर ही लेटना है ।पति देव को उठाया कि चलिये भोजन कर लीजिये ।
चावल ,रोटी,सब्जी,भुजिया,दाल,सलाद,पापड ,दही कुल मिला कर अच्छा भोजन था।नाश्ता तो भारी हो ही गया था फिर भी पेट में जितनी जगह बची थी उसको भर लिया गया ।करीब ढाई बज रहे थे चार बजे चलना है यही सोच कर हमदोनों दो घंटे के लिये विश्राम करने लगे।विस्तर पर लगे हीटर पैड को ऑन करके गुन गुना गुनगुना सा गर्म सेक कमर में लेने लगी थी।मैंने पतिदेव से कहा कि बाबा केदार नाथ ने हाड कंपा दिया था और विष्णु भगवान इस आराम दायक विस्तर पर सुला कर सेंक भी दे रहे हैं ।दोनों अपने जैसे रहते हैं वैसे ही भक्तों के लिये व्यवस्था कर देते हैं ।मानसिक रूप से मैं ते स्वर्ग में ही महसूस कर रही थी ।सोच रही थी कि मैं जो बार बार नहीं आने की जिद कर रही थी अगर नहीं आती तो कहां से इतना आनंद दायी अनुभव प्राप्त होता ।थकान तो थी पर नींद कहां से आती मन तो विष्णु लोक की कल्पना में उडान भर रहा था
जैसा कि हरिद्वार की गंगा में पहली बार स्नान करने वक्त लगा था कि जरूर किसी जन्म का पुण्य है जो उस पवित्र धारा में स्नान करने का मौका मिला वैसा ही लग रहा था कि लाखों कठिनाईयां रहीं जीवन के मार्ग में पर परमेश्वर ने इन सुनहले लमहों को भी हम लोगों के लिये संजो कर रखा था।
18.थोडी ही देर में ऋचा का फोन आया उसने बताया कि देखो खबर आई है कि मौसम फिर खराब हो गया इस कारण हेलिकॉप्टर नहीं आ पायेगा तो हो सकता है कि हम लोगों को रात में यहीं रूकना पडे ।ये न्यूज तो चौकाने वाला था ।पर सारा कुछ ट्रैवलिंग पैकेज के अंदर था तो खर्च बढने की कोई बात नहीं थी और छुट्टी की चिन्ता भी नहीं थी ।मन में हुआ कि अब दो दिन तीन दिन जितना लगे वो ये लोग जाने ।बाबा केदार नाथ ने अपने यहां एक रात रखा था तो विष्णु भगवान भी रखेंगे।हमेंकरना ही क्या है ?जब मन आनंद में रहता है तो किसी भी परिस्थिति में पॉजिटिव बात सोच ही लेता है ।इसीलिये हम सब जो होगा वो अच्छा होगा जो नहीं होगा वो और अच्छा होगा ।यही सोच कर निश्चिन्त थे।इतने आराम दायक विस्तर पर रात भर सोने की कल्पना में डुबकी लगाने लगे ।मानसिक रूप से थोडा रिलैक्स हुए ही थे कि सूचना आई कि रास्ता साफ हो गया है सबको जल्दी हेलि पैड चलना है ।बस फिर क्या था मच गई खलबली थोडा बहुतजो कुछ बिखरा था सबको समेट कर अपने से ही नी कैप पहन कर मैं तैयार हो गई ।स्टाफ आकर सामान ले गये हम सब एक दूसरे को सतर्क करते हुए कुछ छूटा नहीं न का निर्देश देते हुए होटल सरोवर के बाहर की ओर लपके ।सबसे पीछे मैं टुकधुम टुकधुम चलते हुए जा रही थी ।करीब पांच छे सफेद बोलेरो बाहर खडी थी मैॉ एक में जा कर बैठ गई ।जै गणेश करके गाडियां चलीं पन्द्रह बीस मिनट के बाद हम सब हेलिपैड पहुंच गये ।हेलि पैड पर लाइन से पचासों गाडियां लगी हुई थी ।मै उतरने लगी तो ड्राइवर ने मना किया कि उतरिये नहीं हेलिकॉप्टर आता है तो इतनी तेज आंधी आती है कि गाडियां पीछे वाली खाई में गिर जाती हैं।हम लोगों को ब्रैक मार कर रखना होगा ।सब लोग गाडी में ही बैठे रहे करीब बीस मिनट बाद हेलिकॉप्टर दिखा सब लोग सतर्क हो गये।सब गाडी के अंदर ही थे जब हेलि कॉप्टर आकर लैंड कर गया तब भी उसके पंखे चलते ही रहे।फिर यात्रियों को कार से उतरने की हिदायत मिली ।सब लोग उतर कर उसकी तरफ दौडे ।मैं
19.छडी के सहारे आगे बढ रही थी कि दो क्रू मेंम्बरों ने दोनों तरफ से मुझे पकडा और हेलि पैड के बाईं ओर से पूरे मैदान का चक्कर लगा कर लम्बे रास्ते से ले जाने लगे ।
पंखी की हवा के झोकें से मैं गिर नहीं जाऊं इसके लिये लम्बा रास्ता पकडा गया था।पूरे शरीर की पीडा सहते हुए मैंने रास्ता पार किया ।उन लोगों को सहारे करीब सौ कदम चलने के बाद हेलिकॉप्टर पर चढ पाई सबसे बाद में वही सबसे आगे वाले सीट पर पायलट के ठीक पीछे।ऋचा मेरे साथ बैठी थी ।यात्रा का एक भाग पूरा हो चुका था ।गुप्त काशी ,केदार नाथ ,बद्री नाथ की यात्रा हवाई यात्रा थी ।उसके बाद हम लोगों को ट्रैवलर से जाना था ।वहां से फिर राम राम करते हुए हम लोग उसी होटल अमतारा में पहुंच गये जहां से चले थे ।
सरोवर होटल बद्री नाथ से आने समय जब हम लोग गाडी का इंतजार कर रहे थे तो ऋचा की एक महिला से बात हुई थी ।उसने हम बूढों के बारे में पूछा कि ये लोग कौन हैं ?ऋचाने बताया कि एक सासू मां है और एक मम्मी है ।उनलोगों को आश्चर्य हुआ कि तीन तीन बूढों को लेकर ये लोग कैसे यात्रा कर रहे हैं !उस पर एक तो एकदम लंगडी है ।तब ऋचा ने कहा कि जो लंगडी है न उसने बारहों ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर लिये हैं और अब चारो धाम की यात्रा पर निकली हैं ।ये सुन कर कुछ लोग मेरे पास आये और हाथ जोड कर प्रणाम करके बोले कि हम आपको इसीलिये प्रणाम करने आये हैं कि हम लोग भी सभी ज्योतिर्लिंगों का दर्शन पा सकें ।मैंने कहा कि आप सब तो अभी बच्चे हैं सारी उम्र पडी है अगर भक्ति और ईच्छा है तो अवश्य दर्शन होंगे।
थोडी देर हेलिकॉप्टर में बैठने के बाद मन प्राण स्थिर हुआ शोर मचाते हुए हमारा वाहन चल रहा था ।संध्या वेला थी ।अस्ताचल गामी सूर्य अपने मार्ग पर जा रहे थे।यात्रा का प्रारंभ सूर्योदय के कुछ समय बाद हुआ था ।अब संध्या वेला में लौटना हो रहा था बीच की एक रात केदार नाथ में कटी थी ।हमलोगों की यात्रा का आधा भाग संपन्न हो रहा था ।यहां से उतर कर कहां जाना है पूछने पर अमृतांशु ने बताया कि यहां से उतर कर हरिद्वार के धर्म शाला में जाना है ।क्योंकि अब हवाई यात्रा समाप्त हो जायेगी ।
20.यहां से टैम्पू ट्रैवलर लिया जायेगा जिसमें दस लोगों के बैठने की व्यवस्था होगी ।अमतारा होटल पहुंचतेपहुंचते सूरज डूब गया था पर गोधूलि वेला थी ही रात्रि का आगमन नहीं हुआ था ।उसी समय हेलिकॉप्टर लैंड किया ।सब लोग उतर कर अपने अपने कमरे की ओर बढे पर मैनेजमेंट के स्टाफ ने कहा कि आप सब बाहर हॉल में चलें आपलोगों का सामान वहीं पहुंचा दिया जायेगा आप लोगों के जाने केलिये गाडियां आ गईं हैं ।मेरे लिये ह्वील चेयर भी आ गया था ।मैं सीढियों की रेलिंग पकडते पकडते नीचे उतरी और चेयर पर बैठ गई।वहां से एक बडे मैदान को पार करते करते बाहर हॉल तक आ गई ।तीनों कमरे का सामान वहां आ गया था ।उन लोगों ने सामान पहचान लेने कहा और उनको गाडियों मे रखने लगे ।अमृतांशु होटल से चेक आउट करने के काम में लग गया और ऋचा को कपडे बदलने थे तो वो वाशरूम में घुस गई ।करीब सोलह लोगों को निकलना था इसीलिये तीन चार गाडियां मंगवाई गई थीं।थोडा अफरा तफरी मची पर आधे घंटे में सब सेट हो गया गाडियां होटल के कैंपस से बाहर निकल अपने अपने गंतव्य की ओर चलीं ।होटल के मैनेजर सबको विदा कर रहे थे ।पानी का बोतल और कुछ छूटा हुआ सामान देते हुए पुनःआने का अनुरोध करते हुए ।हमारी दो गाडियां हरिद्वार के एक धर्म शाला की ओर चलीं जहां हमारे लिये तीन कमरे बुक थे ।करीब पांच बज कर पचास मिनट पर हमलोग मंडी धर्मशाला में पहुंचे ।ये धर्म शाला अमृतांशु के जान पहचान के व्यक्ति का था जहां पर ठहरना एवं भोजन बिलकुल फ्री था आप अपने मन से कुछ दान कर सकते थे ।पर यहां आपको कोई सामान ढोने वाला सहायक नहीं मिलने वाला था सारा काम स्वयं करना था ।ये कठिनाई थी शिवम एवं अमृतांशु दोनों ने मिलकर सारा सामान ऊपर पहुंचाया लिफ्ट से मैं एक ओर बैठ कर सबके आने का इंतजार कर रही थी ।धर्मशाला चौखंडी था तीन मंजिला बीच में आयताकार आंगन था जहां चालीस पचास गाडियां लगाई जा सकती थीं।कुछ गाडियां लगी हुई भी थीं ।आंगन के दूसरे छोर पर एक बडा सा मंदिर था जिसमें भगवान विष्णु की खडी प्रतिमा स्थापित थीं।मंदिर का हॉल भी काफी बडा था लगता था कि प्रायःयहां धार्मिक आयोजन यानी कीर्तन भजन होते रहते हैं ।झक सफेद संगमरमर की बोलती सी प्रतिमा ,पूजा केलिये सारे चांदी के पात्र ,सामने राधा कृष्ण का झूला,बडे बडे कलश ,छोटी छोटी कटोरियां,चंदन ,चावल,कुमकुम,फूल,अक्षत,सब कुछ था।वहां एक तरफ म्युजिक सिस्टम पर भजन बज रहा था ।हम लोगों ने भगवान को प्रणाम किया फिर लिफ्ट की ओर वढ गये ।सारा सामान सबके कमरे में पहुंच गया था ।मेरा कमरा लिफ्ट के नजदीक वाला था ।सारे कमरे बीच बीच साइज के थे ।
21.कमरे मे डबल बेड ,कुर्सियां,बाथरूम,एसी,पंखा सबकुछ था ।सब लोग यहां आकर आराम की मुद्रा में आ गये ।सिर्फ अमृतांशु और ऋचा को छोड कर ।अमतांशु होटल मैनेजमेंट से बात करने नीचे गया और ऋचा ने सबके कपडे धोने शुरू किये जो इन दो दिनों में सबने खोल खोल कर रखे थे।उसका कहना था कि रात भर में सारे कपडे सूख जायेंगे ।तो आगे की यात्रा में आराम होगा पता नहीं आगे फिर इस तरह की सुविधा मिले ना मिले ।ऋचा ने सर्फ साबुन मंगवा कर काम शुरू किया था।बाकी लोग कमरे में बैठ कर अपने पास के कुछ स्नैक्स टूंगने लगे थे ।चाय भी पीनी थी जो स्वयं जाकर लाना था ।
पता चला कि सात से नौ बजे तक भोजन का समय है सबको समय से भोजनालय जाकर भोजन कर लेना है।हमलोगों ने इसका ध्यान रखा समय से भोजनालय पहुंच गये ।भोजनालय मंदिर के बगल दाहिनी ओर था बाहर ढेरों जूते चप्पल रखे थे ।वहां भी सेल्फ सर्विस थी ।अपने से थाली उठाकर घूम घूम कर सामग्री लेना था और एक ओर बैठ कर खा लेना था और बाद में जूठी थाली डस्टविन में रख देना था ।ऋचा नेएक थाली में चावल ,रोटी.कढी,अचार,सब्जी,दाल,पापडसब मेरे लिये लेकर आई मैं एक जगह बैठ कर खाने लगी ।बाकी सब लोग अपने से लेकर खाने लगे ।शुद्ध सात्विक स्वदिष्ट भोजन की ऐसी व्यवस्था मुझे तो आश्चर्य चकित कर रही थी कोई तो ऐसे पुण्यात्मा होंगे जिनके पास इतना धन होगा जिससे उन्होंने इतना बडा धर्मशाला बनवाया होगा और आज तक चला रहे हैं ।सारा नियम निर्धारित था अनुशासन की मिसाल थी ।इतने लोग खा पी रहे थे किन्तु कुछ शोर नहीं था ।बस थोडा बहुत चम्मच प्लेट का कट कुट हो रहा था ।वहां भोजन में जो घी डाला गया था उसका स्वाद अद्भुत था ।भर पेट भोजन करके तृप्त मन से हम लोग ऊपर आ गये।
22.चार धाम यात्रा ———-आगे
मैंने अमृतांशु से वहां की व्यवस्था के बारे में पूछा तो उसने बताया कि भोजन तो मुफ्त में मिलता है पर अगर कोई दान स्वरूप कुछ राशि देना चाहे तो दे सकता है लोग आकर देते भी हैं।मैंने कहा कि मेरी भी इच्छा है कि कुछ राशि दान में दूं क्योंकि मुफ्त में क्यूं खाना?अमृतांशु ने सबसे बाद में भोजन किया उस दिन बुध वार था दूसरे दिन वृहस्पतिवार को मेरा और ऋचा दोनों का व्रत था ।कल सबेरे सबेरे निकलना है इस हिदायत के साथ हम लोग सोने आये पर सामान सब समेटते समेटते देर हो ही गई थी ।ऋचा का रूटीन ऐसा था कि सबसे पहले समधिन और बच्चों के कमरे का सामान समेटती थी फिर हमारे कमरे का तब अपने कमरे में जाती थी।करीब बारह एक बजे तक हमलोग सो पाये थे ।दूसरे दिन सबेरे हम लोग नहा धोकर वृहस्पति वार की पूजा करने की तैयारी करने लगे थे।पूजा की सारी सामग्री साथ में थी ही तय हुआ कि नीचे विष्णु मंदिर में ही पूजा की जाय।सबकुछ ले कर हम दोनों नीचे मंदिर में पहुंचे ।इतनी विशाल मूर्ति के पास जीवन में पहली बार पूजा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था ।ध्यान आया कि बद्री धाम में तो खा पी कर दर्शन हुआ था यहां अपने मन से पूरा समय लेकर पूजा करने बैठी थी ।चना दाल जल गुड धूप दीप चंदन सब कुछ था बाकी जो कुछ नहीं था वो मंदिर के डिब्बे में से लेकर हम दोनों मां बेटी ने पूजा की ।जितना कुछ चढा सकते थे वो सब हमने चढाया था पूरी कथा सुनने के बाद प्रार्थना करने लगे थे पूरा भक्ति में सराबोर ।कुछ दूसरे लोग भी आ आ कर पूजा कर रहे थे बाहर सडक से ही मंदिर साफ साफ दीख जाता था सडक पर आते जाते लोग भी आकर प्रणाम करते थे ।विष्णु भगवान की विशाल प्रतिमा खडी लम्बी थी सफेद संगमरमर की आंखें तो बोलती सी दीख रही थीं।लगा कि बद्री विशाल कह रहे हों कि तुम्हें मेरी ऐसी ही प्रतिमा की आवश्यकता थी क्योंकि बद्री धाम के मंदिर में तमाम ताम झाम के बाद भी छोटी प्रतिमा को देख नहीं पा रही थी ।मुझे तो मंदिर की वस्तुओं को छूने में भी डर लग रहा था कि कहीं कोई टोक न दे कि क्या कर रही हैं पर ऋचा को कोई डर नहीं था वो मंदिर में ऐसा व्यवहार कर रही थी जैसे पूरा मंदिर उसी का हो ।जब पति देव का फोन आया कि सारा सामान और सब लोग तैयार हो गये हैं आप लोगों की पूजा हुई या नहीं?तब हमलोगों ने अपनी पूजा का समापन किया और बाहर आकर चबूतरे पर बैठ गई ।ऋचा ऊपर सबको लाने गई मैंने कहा कि अब ऊपर क्या जाना यहीं पर से गाडी पर बैठ जाऊंगी ।
23.—मैं नीचे बैठी ही थी कि इतने में एक टेम्पू आया जिसमें ढेर सारे केले भरे हुए थे।कुछ लोग आये और केले उतार कर चबूतरे पर रखने लगे ।उन लोगों ने मुझसे कहा कि आप एक ओर हट जाइये यहां पर संतों को जलपान करवाना है ।मैं चबूतरे पर से उतर कर नीचे वरामदे में रखी कुर्सी पर बैठ गई । मैंने देखा कि केलों के बाद बाल्टियों में गरम गरम दूध लाया गया ।चबूतरे पर केला मेवा दूध सब सजा कर रखा गया था ।सूचना आई थी कि करीब डेढ दो सौ साधु पैदल आ रहे थे उनके लिये ये जलपान की व्यवस्था थी ।
इधर हम लोगों की तैयारी हो गई थी सामान को बाहर खडे टेम्पू ट्रैवलर में ले जाना था ।कोई सहायक नहीं था अमृतांशु एक छोटा टेम्पू ले आया जिससे सामान ले जाने मेंआराम होगा टेम्पू आ भी गया परधर्मशाला के कार्यकर्ता बिगड गये क्रोध करने लगे कि टेम्पू अंदर क्यों आया बाहर जाओ साधु संत आ रहे हैं अभी उनका स्वागत होगा ।टेम्पू वाला बेचारा बाहर चला गया उसके बाद करीब पचास साठ साधु आये सबकी सेवा की जाने लगी।
साधु लोग तृप्त होकर जा रहे थे स्वयं सेवकों के चेहरे पर असीम संतोष नजर आ रहा था ।मैं सोचने लगी कि भगवान धन दे तो उसका सदुपयोग इसी तरह करना चाहिये धर्म शाला बनवाओ अन्न जल फल मेवा दान करो इसी में जीवन सिद्ध हो जाता है।हम लोग अपने समय से पीछे चल रहे थे बाहर टैम्पु ट्रैवलर खडा था और भीतर सारा सामान पडा था ।कोई हेल्पर नहीं ।ड्राइवर को तो ध्यान भी नहीं था कि सामान भी चढवाना है ।अमृतांशु और शिवम दोनों सामान लाने लगे थे ।ड्राइवर को जब कहा गया कि थोडा जाकर सामान व्यवस्थित कर दो तो वे अनमने ढंग से उतरा और गाडी के पीछे जाकर कमर पर हाथ रख कर खडा हो गया।अमृतांशु ने कहा कि खडे क्यों हो सामान रखवाने में मदद करो तो उसने थोडा बहुत हाथ बंटाया ।उसके व्यवहार से लग रहा था कि उसने गाडी लाकर एहसान कर दिया हो ।चलो जो भी हो सारा सामान रखवा कर ऋचा दूकान की ओर लपकी ।तीन चार तरह के कोल्डड्रिंक्स मिल्क बादाम टॉफी बिस्कुट चिप्स अनेक तरह के स्नैक्स खरीदने लगी ।हमलोगों के साथ ड्राइवर भी हडबडाने लगा कि क्यों इतनी देर कर रही है पर ऋचा को याद था कि व्रत में मां कोल्ड ड्रिंक्स पीयेगी नहीं तो मिल्क बादाम लेना जरूरी है फिर रास्ते में लड्डु ले लेंगे।उसने याद से ऑक्सीजन का बोतल भी ढूंढ कर खरीदा क्योंकि जो बोतल केदार नाथ धाम में मिला था वो खत्म हो गया था ।सबकुछ खरीदने के बाद सडक की यात्रा प्रारंभ हुई ।अब हमें प्राकृतिक दृश्य का अवलोकन करते हुए यात्रा करनी थी ।
गाडी न नई थी न पुरानी बीच बीच की थी उसका ए सी भी खराब था वैसे मौसम भी ठीक ही था न ठंडा न गरम पर ए सी की आदत रहने के कारण कठिनाई हो रही थी ।धीरे धीरे ए सी की बात हम लोग भूल गये और झरखराती हुई गाडी में हिचकोले खाते हुए आगे बढने लगे ।बसे हुए शहर को पार करने में कठिनाई हो रही थी चिल्ल पों जाम से बचते बचाते हमारी गाडी चली अपने गंतव्य की ओर।यात्रा का क्रम ऐसा था कि केदार नाथ बद्री नाथ के बाद यमुनोत्री फिर गंगोत्री की यात्रा होती है पर अमृतांशु यात्रा के नियम से ज्यादा यात्रियों की सुविधा का ख्याल रख रहा था ।इसीलिये जहां पर रात्रि शयन का रिजर्वेशन मिला वहीं पहले जाने का निर्णय लिया। यात्रा करने वाले एजेन्ट से लगातार बातें हो रही थी। उसको कहा गया कि जहां के होटल में जगह मिल रही है वहीं की यात्रा पहले करवाओ तो तय हुआ कि पहले गंगोत्री ही जाया जाय वहां के होटल में जगह मिल रही थी ।हम लोग वहीं की तैयारी करने लगे मानसिक रूप से ।सब लोग ड्रिंक्स स्नैक्स का आनंद लेते हुए यात्रा कर रहे थे ।गप चल रहा था कि अगर हवाई जहाज से यात्रा करते तो चार दिन में ही यात्रा समाप्त हो जाती इतना मजा नहीं आता ।सात आठ दिन तक यात्रा ही यात्रा ।पर एक बात थी कि 9 मई से 21,22मई तक करीब दस ग्यारह दिन की यात्रा में हम लोगों की यात्रा कहीं ऐसी नहीं रही कि रात्रि में कहां ठहरें इसकी चिंता करनी पडी हो ।हर जगह हर रात हम सब आराम से होटल टेन्ट या धर्मशाला जैसे जगहों पर सोये थे।रात्रि में कहीं कोई परेशानी नहीं हुई ।कह सकते हैं कि एजेन्ट के साथ व्यवस्था का तार बहुत अच्छे से जुटा हुआ था ।कुल मिला कर हमारी यात्रा आनंद एवं आराम दायक हो रही थी ।
25.हरिद्वार से सुबह आठ बजे हम लोग चले थे वहां से गंगोत्री जाने के लिये हमें हर्षिल जाना था जहां के एक बडे होटल में हमलोगों के रूकने की व्यवस्था थी ।बहुत आगे जाने के बाद ऊंचे ऊंचे पहाडों को काट कर बनाई गई सडक पर हम लोगों की गाडी सरपट भागी जा रही थी सडक के बाईं तरफ पहाड थे और दाईं तरफ गहरी खाई खूब ऊबड खाबड जिसमें गंगा उछलती कूदती जा रही थी ।उसका अजस्त्र प्रवाह क्षीर सागर की तरह दीख रहा था एकदम झक सफेद कहीं बहुत चौडा कहीं एकदम पतला ।हम यात्रियों के पास दो ही विकल्प थे या तो सह यात्रियों के साथ मिलकर कुछ खायें पियें या बाहर के प्राकृतिक दृश्य को आंखों में सहेज समेट कर यादाश्त में सेव करने की को शिश करें ।सडकें तो अच्छी थीं मार्ग में कुछ जगहें सुन सान थीं और कहीं कहीं गांव या शहर बसे हुए थे ।दिन भर की रोशनी में तो बडे आराम से गंगा की हरहराती हुई आवाज और दृश्य का आनंद मिल रहा था पर संध्या होने के बाद जैसे अंधेरा घिरते गया वैसे वैसे हम जल्द से जल्द पहुंचने के लिये उतावले होने लगे ।जब भी कोई शहर आता तो बिजली के प्रकाश के चकाचौंध में हम लोगों को लगता कि हर्षिल आ गया है ।उसके बाद जो सुन सान जगह आती तो अंधेरा देख कर घबराहट होती कि ये यात्रा तो अनंत लग रही है।उस जगह पहुंच कर लगता कि अब कोई शहर नहीं है जंगल ही जंगल है किन्तु थोडी देर बाद फिर रोशनी से भरा पूरा शहर आ जाता ।इस प्रकार दो तीन घंटे तक यात्रा करते करते धैर्य छूट सा रहा था कि गंतव्य कब तक आयेगा ।ये भी चिन्ता हो रही थी कि कहीं गलत रास्ते पर तो नहीं चल रहे हैं।वैसे हम लोगों का ड्राइवर एक्सपर्ट था उस मार्ग पर उसका रोज का आना जाना था हम लोगों के अधीरता को देख कर उसको आनंद आ रहा था ।जबतक धैर्य समाप्त होकर व्याकुलता न बढ गई तबतक हर्षिल नहीं आया ।करीब दस साढे दस बजे रात में हम लोग आखिरउस होटल में पहुंच गये जहां ठहरना था ।अच्छा बडा सा होटल था करीब पन्द्रह से बीस सीढियां थी जिसमें रेलिंग नहीं था ।मैं तो घबडा गई कि चढूंगी कैसे अमृतांशु ने मैनेजर से बात करके ग्राउंड फ्लोर पर ही एक कमरे की व्यवस्था कर दी बाकी लोग पहली मंजिल पर अपने अपने कमरे में जाने लगे ।ग्राउंड फ्लोर पर जाने के लिये भी पन्द्रह सीढिया चढनी थी जिसे मैं दोनों तरफ से बच्चों को पकड कर पार कर पाई वहां से आगे बढ कर बाईं ओर मेरा कमरा था जहां पहुंच कर मैंने चैन की सांस सी ।कमरा छोटा ही था पर सुसज्जित था आधुनिक संसाधनों से लैस ।अटैच लैट्रिन बाथरूम ,डबल बेड ,सोफा ,कुर्सियां सब साफ सुथरा प्रकाश से जगमगाता हुआ बडा सा आईना सब कुछ ।ऋचा ने कहा कि तुम लोगों का खाना यहीं कमरे में भिजवा देती हूं क्योंकि तुम ऊपर नहीं जा सकोगी ।हम लोगों ने हामी भर दी और विस्तर पर निढाल होकर लेट गये ।
26.थोडी देर में चाय आ गई चाय पीकर थोडा अच्छा लगा ।इतनी दूर में इतना बढिया होटल जहां पिज्जा वर्गर सब मिलता हो ।शिवम परम तो बहुत खुश हुए पसन्द का भोजन मिल रहा था नीचे ऊपर दौड लगा रहा था ।थोडी देरमें भोजन आ गया चावल,दाल,रोटी,सब्जी,सलाद ,चटनी सब।भोजन के बाद थाली वगैरह भिजवा कर हम लोगों ने तय किया कि कल क्या पहनना है खुले हुए कपडे को कहां रख देना होगा सारे सामान को संभाल कर हम लोग सो गये ।लोग कहते हैं कि नई जगह पर नींद नहीं आती है पर लगातार यात्रा से हमलोग ऐसे थक गये थे कि होश ही नहीं रहा कि जगे हैं कि सोये हैं ।चन्द्र मिनट में निद्रा देवी की गोद में चले गये ।
काल की अबाध गति में हम लोग बहे जा रहे थे सुबह चार बजे ही नींद खुल गई।सबसे पहले तैयार होने के उत्साह में मैंने अपना नित्य कर्म प्रारंभ कर दिया था ।छे बजे तक स्नान ध्यान करके तैयार हो कर बैठ गई। आज हम लोगों को गंगोत्री धाम जाना था जो इस होटल से थोडी ही दूर पर था ।पता चला कि होटल में ही अनुपूरक जलपान की व्यवस्था है जो साढे आठ बजे से प्रारंभ होगा ।अब साढे आठ बजे तक इंतजार करना था ।ऊपर से भी सब लोग नीचे के जलपान गृह में आ गये थे और इंतजार करने लगे ।ऋचा और उसके पापा वहां की दूकान में कुछ कुछ खरीदने लगे ।उन लोगों को एक मोटा सा शॉल पसन्द आया जो हस्त करघे पर बना था।तीन शॉल खरीदा गया वहीं “अतीत की गाथा “पुस्तक खरीदी गई। तबतक साढे आठ भी बज गये हमलोग नाश्ते के टेबुल पर पहुंच गये ।हमलोगों को ब्रेड बटर ,पोहा,पूडी सब्जी,आमलेट,चाय कॉफी वगैरह नाश्ते में मिला ।नाश्ता पानी करके सब लोग फिर से गाडी में बैठ गये।सबने अपने कपडे भी ले लिये थे कि अगर मौका मिला तो स्नान भी किया जायेगा ।जहां तक कि गाडी जा सकती थी वहां तक जाकर फिर पैदल जाना था ।अशक्त लोगों केलिये ह्वील चेयर की व्यवस्था थी ।मोल भाव करके तीन चेयर की व्यवस्था हुई हम तीनों सिनियर सिटीजन कुरसी पर बैठ गये जहां तक कुर्सी जा सकती थी वहां तक पहुंचा कर हम लोगों को उतार दिया गया ।मैं अपनी छडी के सहारे शिवम का हाथ पकड कर आगे बढने लगी ।वहां अच्छी भीड थी धक्कम धुक्की थी।इसी में बढते बढते मेन गेट तक पहुंच गई मैंनें परेशान होकर वहां खडे सिपाही से मदद मांगी उसने दूसरे मार्ग से मुझे अंदर पहुंचा दिया मेरे साथ सब लोग मंदिर के प्रांगण में प्रवेश कर गये ।
27.प्रांगण बडा था बीच में मेन मंदिर फिर चारो तरफ छोटे छोटे मंदिर थे ।जगह जगह पर स्टील की लम्बी लम्बी कुर्सियां लगी हुई थीं हम लोग एक जगह कुर्सी पकड कर बैठ गये ।अमृतांशु पता लगाने गया कि गंगोत्री में स्नान कैसे हो सकता है ?मंदिर के प्रांगण के एक ओर बीस पच्चीस सीढियां थीं दोनों तरफ रेलिंग नहीं था मैंने तो हाथ खडे कर दिये कि मैं नहीं जा सकती समधिन और पतिदेव ने भी मेरे मार्ग का अनुगमन किया अमृतांशु ऋचा बच्चों के साथ स्नान करने के लिये सीढियां उतरने लगे।
प्रांगण में भीड थी आने जाने वाले यात्री गण अपने अपने ढंग से पूजा कर रहे थे और जयकारा लगा रहे थे जैसा कि आम मंदिरों में होता है ।हम लोग हल्की हल्की धूप में बैठे बैठे नजारा देख रहे थे थोडी थोडी देर में पानी भी पीते जा रहे थे।किसी नकिसी पुण्य का ही फल है कि हम लोग मां गंगा के प्रांगण में बैठे हैं ।स्नान कर के लौटने के बाद ऋचा ने बताया कि जहां स्नान करने गई थी वहां ठेहुना भर ही पानी था पर वर्फ से ज्यादा ठंडा और बहुत तेज बहाव ।वहां डुबकी नहीं लगाया जा सकता था छोटी बडी चट्टानें थीं जिस पर बैठ कर नहाया जाता था वो भी किसी लुटिया ग्लास जैसे पात्र के साथ।ऋचा ने बताया कि वो एक चट्टान पर बैठ गई और अमृतांशु किसी से लोटा मांग कर उसके ऊपर जल डालने लगा।ऋचा को लगा कि वो जम जायेगी उसकी जोर से चीख निकली शीत के भय के कारण उसी तरह शिवम परम अमृतांशु भी नहाने में सफल हो गये ।मां गंगा की शीतल कंचन धारा में स्नान का ये अनुभव अनूठा अविस्मरणीय था ।उन लोगों का विवरण सुन कर मैं सोचने लगी कि एक तो मैं सीढियां पार नहीं कर पाती दूसरे इतनी ठंड को भी शायद झेल नहीं पाती ।माता गंगे को प्रणाम कर के कहा कि यहां तक बुला लेने के लिये बहुत बहुत आभार है मां।आपके आंचल की छांव में बचपन जवानी सब बीता है पता नहीं कितनी बार स्नान कर चुकी हूं ।भागलपुर ,पटना,बनारस,विंध्याचल,प्रयाग राज ,ऋषिकेश,हरिद्वार सब जगह पर यहां गंगोत्री आ कर डुबकी नहीं लगा पाई ये मेरा दुर्भाग्य है पर आ पाई यहां तक इसी लिये पुलकित भी हूं।
28.अब सबलोगों का मंदिर में दर्शन करने के लिये जाने का समय था ।मैंने कहा कि तुम लोग जाओ मैं यहीं से प्रणाम कर लेती हूं तो ऋचा ने डांटा कि मंदिर जाने में क्या है चलो दर्शन कर लो इतनी दूर आई हो द्दर्शन भी नहीं करोगी ।मैं तो दर्द के डर से नहीं जा रही थी फिर हिम्मत करके उठी और मंदिर की ओर जाने लगी । भीड तो थी ही पर वी आई पी गेट से प्रवेश मिल गया मंदिर के वरामदे पर ही बैठा कर पूजा पाठ दर्शन करवाया गया।मंदिर के अंदर मां गंगा की स्वर्ण प्रतिमा थी खडी खूबसूरत ।ऐसी प्रतिमा मैंने आज तक नहीं देखी थी ।अगर नहीं आती तो बहुत बडी चीज छूट जाती ।पूजा पाठ करवाने के बाद पंडित जी ने कहा कि अब आपलोग खडे होकर प्रणाम करते हुए मंदिर के दरवाजे पर से ही दर्शन करते हुए निकल जाइये ।सबने ऐसा ही किया ।वहां से निकल कर अन्य मंदिरों में भी पूजा की गई उसके बाद सबका ध्यान पेट पूजा पर गया ।किसी अच्छे होटल में भोजन किया जाय इसी उद्देश्य से हमलोग मंदिर से बाहर की ओर चले।
एक और काम हम लोगों ने किया था ह्वील चेयर चलाने वाले लडके को कहा था कि तुम हम लोगों के साथ ही चलो सामान देखना और हमें पकड कर चलने में भी आराम होगा ।जब भोजन की बात आई तो उसे भी कहा गया कि तुम भी भोजन कर लो ।उसने कहा कि मेरा एक भाई भी है उसको भी बुला लूं?अमृतांशु ने कहा कि हां बुला लो ।उसके बाद आगे बढ कर अमृतांशु ने एक होटल मेंजगह ले ली थी ।वो मंदिर से थोडी दूर पर था बाकी लोग तो पहुंच गये पर मैं धीरे धीरे चलते हुए सबसे बाद में पहुँची ।वहां जगह लेकर भोजन का इंतजार करने लगी ।भोजन में सबकुछ था
29.चार धाम यात्रा ———-आगे
छोले भटूरे ,मसाल डोसा ,चावल दाल,रोटी सब्जी ,पकौडे यानी धर्मस्थलों में जितना कुछ होता है सब था ।कोल्ड ड्रिंक ,चाय,कॉफी,जूस सबने इच्छानुसार जम कर खाया उन दोनों ह्वील चेयर चालकों ने भी।खा पी कर मुखशुद्धि लेकर हम लोग अपने गंतव्य की ओर बढे ।ह्वील चेयर तक पहुंचने के लिये थोडी दूर और चलना था उन लोगों का हाथ पकड कर वहां तक पहुंची फिर चेयर पर विराजमान हो गई।ह्वील चेयर चालक गाडी तक ले जाने लगा हमारी गाडी थोडी दूर पर जाकर रूकी थी पर वैसी ही दूसरी गाडी नजदीक में थी भ्रम वश हमने उसी गाडी को अपनी गाडी समझ लिया वहीं रूक कर चालक ने ड्राइवर को जाकर उठाया कि अपने पैसेंजर बिठा लो वो आया और मुझे देख कर बोला कि ये मेरे पैसेंजर नहीं हैं हम लोग तो भौचक रह गये कि अपने ड्राइवर को नहीं पहचानते हैं इतने में ऋचा का फोन आया कि तुमलोग कहां हो ?हमने बताया कि हमलोग आगे आ गये हैं फिर हमे पीछे जाने का निर्देश मिला पीछे जाकर एक बडे से पेड के पास रूकना था जहां सबलोग जमा थे ।फिर हमलोग पीछे लौटे वहां जाकर पता चला कि गाडी और पीछे है और आरही है ।थोडी देर में गाडी आ गई हम सब सवार हो गये उन तीनों चालकों को मेहनताना से अधिकपैसे दिये गये खुशबख्ती मेंउनकी सेवा से हमलोग खुश थे ।हमलोग अपना सारा सामान साथ लेकर ही चले थे कि दुबारा होटल में नहीं जाना पडे ।वहीं से गंगा मैया को प्रणाम करते हुए हमलोग आगे यमुनोत्री की तरफ बढे।वहां जाने केलिये हमें एक दिन उत्तर काशी में रूकना था ।संयोग से उत्तर काशी में होटल में जगह नहीं मिली थी वहां गंगा किनारे एक मैदान में आवासनुमा टेंट लगे हुए थे वहीं टेंटों में रात्रिविश्राम के लिये बुक किया गया था ।
चार धाम यात्रा —-आगे
गंगोत्री से उत्तर काशी की यात्रा करीब सात आठ घंटे की थी फोन से ही पता चल चुका था कि वहां टेंट में रहना होगा तीन टेंट बुक किये गये थे वहीं बडे से मैदान में एक भोजनालय था हम लोगों ने रास्ते में ही तय कर लिया था कि भोजन उसी भोजनालय में किया जायेगा इधर उधर भटकने की जरूरत नहीं है।करीब तीन चार बजे पहुंचने के बाद हम लोग सबसे पहले भोजनालयमें जाकर बैठ गये सामान सब गाडी में ही रहा क्यों कि अभी टेंट खाली नहीं हुआ था ।वहां गरम गरम चावल ,दाल,सब्जी ,रोटी .पापड ,अचार,सलाद सबकुछ मिला हम लोग तृप्त हुए ।करीब एक घंटा लगा तबतक टेंट खाली होकर व्यवस्थित हो चुका था ।जीवन में पहली बार टेंट में रहने का मौका मिला था इससे कुछ ज्ञानवर्धन भी हो रहा था कि मकान बनाने के इतने तामझाम की क्या जरूरत है जबकि इतने कम साधन में रहने लायक जगह बन सकती है ।
एक चौदह बारह फीट के चबूतरे को दो भागो में बांट दिया गया था तीन फीट और नौ फीट ।तीन फीट वाली जगह को पांच इंच की दीवार से घेर दिया गयाथोडा सा मार्ग छोड कर।वहीं पर एक ओर कमोड हैंड शावर लगा हुआ था दूसरी ओर नल वाश वेसिन एक बडी बाल्टी मग एक स्टूल ऊंचा सा लगा दिया गया था कपडे टांगने के लिये खूंटी भी लगी हुई थी यानी फ्रैश होने का इंतजाम पूरा था ।उसी छोडे हुए मार्ग से सटा कर बडा सा टेट लगाया गया था उसको अंदर दो बडे बडे चौकी पर वेड बिछे थे तकिया समेत एक तरफ टेबुल फैन ,ऊपर सिलिंग फैन दो फानूस दो बल्ब टंगे थे ।फानूस बांस की डलिया जैसा था जिसके अंदर भी ब्लब लगे हुए थे साइड में दो कुर्सियां थीं एक सिंगल सोफा ।यानी कमरे में रहने वाली करीब करीब सारी सामग्री जुटाई गई थी ।टेंट लोहे के फ्रेम से बना था जिसे तिरपाल से ढका गया था टेंट का दरबाजा भी तिरपाल में एक चेन लगा कर बनाया गया था ।यानी जब कमरा बंद करना हो तो चेन लगाकर बंद कर दें खोलना हो तो चेन खोल कर उस प्लास्टिक के परदे को ऊपर उठा दें।इतने कम साधन में इतनी व्यवस्था देख कर अच्छा लगा ।उधर भोजनालय के कार्य कर्ता लोग हर टेंट में जाकर गरम पानी .चाय ,नाश्ता वगैरह का आर्डर ले रहे थे ।
30.गंगा से सटे उस मैदान में करीब दस बारह टेंट थे जो सब यात्रियों से भरे हुए थे ।उस टेंट का भी एक रात का किराया दस हजार था ।गंगोत्री मंदिर में तो गंगा स्नान नहीं कर पाई थी पर इतने नजदीक गंगा जी को देख कर मेरी गंगा स्नान की इच्छा प्रबल हो गई थी ।मैंने अमृतांशु से कहा कि इतनी नजदीक गंगा जी हैं मैं चाहती हूं कि गंगा स्नान करूं क्या मैं कर सकती हूं ?उसने कहा कि कर तो सकती हैं मां पर वहां तक जाना आपके लिये संभव नहीं हो पायेगा क्योंकि बडी ऊबड खाबड जगह है आप उतर नहीं पायेंगी ।तब मैंनें कहा कि छोड दीजिये।
हम लोग चाय नाश्ता करने लगे ।थोडी देर में अमृतांशु ने आकर बताया किआपके स्नान का प्रबंध हो गया है ।यहां कुछ नौजवान स्टाफ हैं जो आपको कुर्सी पर बिठा कर गंगा तक ले जायेंगे ।बोलिये आपको स्नान करना है ?मैं सहर्ष तैयार हो गई ।मैंने ऋचा को कहा कि मेरे कपडे निकाल दे जिसे लेकर मैं स्नान करने जाऊंगी ।उसके बाद टेंट से बाहर आकर मैं ह्वील चेयर पर बैठ गई कुछ दूर जाने के बाद वो स्थान आया जहां पांच छे फीट नीचे उतरना था मैं कुर्सी छोड कर नीचे उतरी और गंगा किनारे एक चट्टान पर आकर बैठ गई।पर वहां उतना पानी नहीं था कि स्नान किया जा सके।मैंने कहा कि एक प्लास्टिक की कुर्सी और बाल्टी मग लाकर दे दो तभी स्नान हो पायेगा।होटल के स्टाफ ने सारा सामान ला दिया और आगे नदी के किनारे जगह देख कर कुर्सी जमा दी कि प्रवाह में बह नहीं जाय।ऋचा ने मुझे पकड कर कुर्सी पर बिठा दिया मैंनें बाल्टी को टेढा कर पानी भरा और एक गैप में बाल्टी जमा कर मग से स्नान करने लगी ।गंगा अपनी गति से बहती जा रही थी प्रवाह तेज ही था गंगोत्री की गंगा के वेग का वर्णन बच्चों से जान ही चुकी थी शिवम ,परम ,ऋचा,समधिन सब वहां किनारे के चट्टानों पर बैठे थे।समधिन ने भी स्नान करने की इच्छा प्रगट की ।वहां अलग अलग चट्टानों पर बंगाल से आये लोग बैठे थे जो संध्या कालीन गंगा का आनंद ले रहे थे परस्पर पानी से खेल भी रहे थे।मां गंगे को प्रणाम करते हुए मैंने कहा कि मां तुम मनःस्थिति समझ जाती हो गंगोत्री में स्नान नहीं कर पाने का मलाल मन में था ही अस्वस्थता के कारण वहां सफल नहीं हो सकी थी बडी कृपा है कि गंगोत्री से एक सौ किलोमीटर दूर उत्तर काशी में तुमने स्नान करवा दिया।ऐसी गंगा से मुलाकात तो ऋषि केश में ही हुई थी जहां चार बजे सुबह कार्तिक के महीने में अपनी बहन सरला के साथ स्नान किया था करीब बीस पचीस वर्ष पहले।गंगा जल की असीम शीतलता महसूस करके ऋषि केश की याद आ गई थी ।मैंने तीन चार बाल्टी जल भर भर कर स्नान किया उस प्रबल वेग की धार में कुर्सी पर बैठ कर स्नान करना अपने आप में एक अद्भुत अनुभव था ।सब लोग संध्या कालीन दृश्य का मजा ले रहे थे ।अस्ताचल गामी सूर्य अपनी लाल लाल किरणों से गंगा को देख रहे थे ।हम लोगों के ऊपर भी अपनी कृपा बरसा रहे थे । थोडी देर ऐसा ही चला उसके बाद होटल के स्टाफ कुर्सी लेकर जाना चाह रहे थे क्योंकि काम का समय हो गया था।समधिन भी स्नान करके कपडे बदल चुकी थीं।हम लोग लौटने की तैयारी करने लगे ।
31.हम सब लौटे नीचे से ऊपर वाली जगह पर इस बार मैं अपनी कोशिश से चढ गई उसके बाद ह्वील चेयर पर बैठ कर टेंट तक आई।गंगा स्नान का कार्यक्रम पूरा हुआ ।सब बडे खुश थे ।यहां भी भोजनालय की व्यवस्था थी जहां आठ बजे तक रात्रि का भोजन मिलने लगता था ।मैं ने ऋचा से कहा कि मेरा भोजन टेंट में ही पहुंचवा दे क्यों कि मैं नहीं जाना चाहती हूं।ऋचा नेसोचा कि मां पापा दोनों टेंट में खायेंगे तो उसने दो प्लेट खाना भिजवा दिया जबकि उसके पापा भोजनालय में ही चले गये थे। मेरे पास दो प्लेट भोजन था एक प्लेट तो बर्वाद ही होगया खाना वही सिंपल रोटी सब्जी ,दाल चावल ,पापड दही ,सलाद ,वगैरह था । अब गंगोत्री दर्शन हो चुका था यमुनोत्री जाना था उत्तर काशी से यमुनोत्री की दूरी 126किलो मीटर है वहां जाने के रास्ते में बरकोट रूकना था वहां के रिसॉट में इम लोगों की बुकिंग थी ।उत्तर काशी के टेंट के मालिक ने दूसरे दिन सुबह हम लोगों को नाश्ता करवा के पेमेंट वगैरह लेकर विदा कर दिया था।हम लोगों को अब बारकोट जाकर रूकना था ।बार कोट से यमुनोत्री जाने के लिये हमें ऊंची चढाई चढनी थी ।बार कोट से जानकी पट्टी 45किलो मीटर उसके बाद यमुनोत्री की चढाई शुरू होती है।ये खडी चढाई थी करीब सात किलो मीटर की।उत्तर काशी से बार कोट के लिये हम लोग करीब नौ बजे निकल गये रास्ते में शहर ही शहर था ।
कुछ दूर पहाडी रास्ता था करीब चार पांच बजे तक हम लोग बारकोट पहुंच गये यहां का रिसॉट मिला जुला था पक्की छत वाले कमरे टेंट सब मिला जुला था ।हम लोगों को पक्की छत वाले तीन कमरे मिले थे रात भर के लिये दूसरे दिन हमें जानकी पट्टी के लिये निकलना था ।वहां पहुंच कर हमलोगों ने चाय पकौडे का आर्डर दिया थोडी ही देर मेंढेर सारे पकौडे
और चाय आ गई ।कमरा बडा आयता कार था ।
32.चार धाम यात्रा ——-आगे
वाथरूम भी बहुत बडा था प्लास्टिक के तारों से बनी ढेर सारी कुर्सियां कमरे में और कमरे से बाहर वरामदे पर रखी हुई थी।वरामदे से उतर कर थोडा सा लॉन था जिसके आगे जल धार बहती हुई जा रही थी ।उसकी आवाज वातावरण में गूंज रही थी ।बडा पवित्र माहौल था।मैं वरामदे में बैठ कर प्रकृति का सौंदर्य निहार रही थी ।बच्चे सब नीचे उतर कर जल धार देखने चले गये थे ।प्रकृति की गोद में इधर हरियाली उधर जल की धारा लगता था कि प्रकृति के पांचों तत्व एक साथ एकत्रित हो गये हों ।मैंने जल प्रपात का नजदीक से फोटो लेने के लिये कहा था एक अनोखा दिव्य वातावरण लग रहा था।
रात्रि वेला में कहा गया कि जल्दी जल्दी खाना खा कर सो जाना है क्योंकि सुबह सुबह तीन चार बजे ही यमुनोत्री के लिये
निकल जाना है ।मेरा खाना तो कमरे में ही आ गया सब लोग खा पी कर जल्दी सोने चले गये ।सुबह चार बजे ही दरवाजे की घंटी बज गई अमृतांशु ने उठ कर सारे कमरे के लोगों को जगा दिया नित्य कर्म से निवृत हो कर सब लोगों ने स्नान ध्यान किया और तैयार होकर गाडी में बैठ गये ।भोर होने के पहले का समय था लुक छुप अंधेरे में हमारी यात्रा आरंभ हुई ।बहुत आनंद दायक मौसम था सब लोग बिलकुल फ्रैश और उत्साह से भरे हुए थे कचर वचर प्रारंभ था ।कुछ कुछ स्नैक्स भी उड रहा था पहाडी रास्ता पहाड के किनारे किनारे चौडी सडक गोल गोल घुमाव दार मार्ग पर चलते हुए हम लोग रात्रिवेला के पिछले प्रहर को दिन में बदलते देख रहे थे ।धीरे धीरे उजाला पसरते जा रहा था पूर्व दिशा में लालिमा का प्रारंभ हुआ धीरे धीरे सूर्य झांकने लगे ऐसा परिवर्तन तो नित्य का नियम है पर इतने विस्तार से देखने का अवसर तो घर के अंदर नहीं मिलता है ।इस मार्ग पर इतने व्यापक दृश्य दीख रहे थे प्रकृति का सान्निध्य बडा सुखद था ।ये यात्रा भी बहुत लम्बी थी मार्ग भी कच्चे पक्के थोडी दूर तो ऊबड खाबड भी पर चलने की धुन में हमारा ड्राइवर लगातार सक्रिय था ।खांटुश्याम बाबा के भजन को तेज आवाज में बजाते हुए चल रहा था आवाज कम करने के लिये बोलने पर कहता था कि सुबह सुबह का समय है न मैडम
नींद आने लगती है इसी लिये तेज आवाज में सुनता हूं ।हम लोग निरूत्तर हो जाते थे चलो जैसा तुम करो हम लोगों का जीवन तो तुम्हारे ही हाथ में है ऐसा न हो कि इधर तुम्हे नींद आये और उधर हम लोग आउट ऑफ बर्ल्ड हो जायें ।
हमें बारकोट से जानकी चट्टी तक जाना था ।बीच में सपना चट्टी हनुमान चट्टी पडता है तब जाकर आता है जानकी चट्टी ।सब जगह
शहर जैसा कुछ था स्कूल कॉलेज अस्पताल ऑफिस सब थे उन पहाडियों के बीच बीच में
33.जानकी चट्टी वो स्थान है जहां तक रोड से पहुंचा जा सकता है उसके बाद आपको पैदल जाना होगा या पालकी या पिट्टु जो भी आप लीजिये ।जानकी चट्टी से यमुनोत्री तक सात किलो मीटर का मार्ग है जो एकदम पहाडी मार्ग है सीधी ऊंची चढाई ।जानकी चट्टी पहुंचते ही हमारी गाडी को पालकी वाले घोडे वाले और पिट्ठुओं ने घेर लिया ।सबसे मोल भाव होने लगा ।उन लोगों में भी कुछ दलाल थे जो यात्रियों और पालकी वालों को मिला देते हैं और अपना कमीशन ले लेते हैं ।कुल मिला कर आधे घंटे तक विचार विमर्श के बाद तीन पालकी हम तीन लोगों के लिये तय हुआ ।पालकी सुनकर आप सुन्दर राजकुमारीकी पालकी की कल्पना नहीं कर लें क्योंकि जिस पालकी पर हमलोगोंने यात्रा की है न वो पालकी वस्तुतःएक काठ की छोटी कुर्सी थी जिसपर बडी मुश्किल से मेरा पार्थिव शरीर अटा था जो करीब नब्बे किलो का था।कुर्सी के दोनों ओर दो बडी लकडी का टुकडा बांधा हुआ था जिसके कोर दोनों तरफ कमर में गडते थे सिर के पास भी ऐसा आधार नहीं था जिस पर टिक कर गर्दन को आराम दे सकें हां पांव के पास पांवदान जैसा कुछ लगा हुआ था जिस पर पंजा टिका कर पांव के दर्द से कुछ आराम पाया जा सकता था ।दोनों लकडी के चारों छोरों को चार आदमी उठा रहे थे ।बाकी दोनों पालकियों से मेरे पालकी वाले नें पांच सौ रूपये ज्यादा लिये ज्यादा वजन कह कर ।दो पालकी आठ आठ हजार में और मेरी पालकी साढे आठ हजार में तैयार हुई।सब कुछ तय होने के बाद कहा गया कि हम लोग अब चाय पी लें ।गाडी से उतर कर एक छोटी सी दूकान पर बैठ कर हम लोग चाय पीने लगे ।ठंड इतनी अधिक थी कि मेरे हाथ कांप रहे थे उस समय बाथरूम वगैरह का जुगाड बडा मुश्किल लग रहा था ।दूर तक चल कर थोडा ऊपर जाकर बाथरूम की व्यवस्था थी मैं तो चल ही नहीं सकती थी ।मैंने ऋचाको कहा कि चलो उस गाडी के पीछे जाकर पेशाब कर लेते हैं।गाडी के चारो ओर लोग तो थे ही पर मन का संतोष वहीं आड में खडे होकर मैं फ्री हुई ।चाय पीते पीते ऋचा ने मेरे कांपते हाथ पांव को दस्ताने मोजे पहनाये मेरी छडी को किसी पिट्ठु ने किसी दूकान में जाकर रख दिया ।अब हम लोग जीते जी चार लोगों के कंधे पर जाने की तैयारी करने लगे॥
हम तीन लोगों के साथ बारह लोग थे सात किलोमीटर की खडीचढाई किसी अकेले के बस की बात नहीं थी बाकी चार लोगों ने सोचा था कि पैदल ही चलेंगे किन्तु उनके गाइड ने बताया कि बिलकुल खडी चढाई है पैदल चलने में कठिनाई होगी नहीं हो तो आप लोग एक एक घोडा कर लें तो शिवम परम अमृतांशु ऋचा सबके लिये घोडों की व्यवस्था की गई अब सब साथ चलने की तैयारी करने लगे।करीब चार किलोमीटर चढाई करने के बाद एक जगह पर विश्राम के लिये तीनों पालकी रोकी गई ।वाहकों का लीडर सामने आया और बताया कि अब हम लोग नाश्ता करेंगे जिसका पैसा आप लोगों को देना पडेगा ।पहले तो मैं आकाश से गिरी साढे आठ हजार रूपया ऊपर से चार लोगों का नाश्ता तीनों पालकी मिला कर बारह लोगों का नाश्ता ये तो बेईमानी है पर जब पता चला कि यही रेट है सब लोग देते हैं तो हामी भर दी कि ठीक है जाओ खालो सब जो बिल हो बता देना पेमेंट हो जायेगा ।करीब एक घंटा वहां रूकना पडा ।हम लोगों ने भी कुछ स्नैक्स लिये चाय पी पालकीवाली कुर्सी से निकल कर होटल वाली कुर्सी पर बैठी इस कुर्सी पर कुछ आराम मिला ।थोडीदेर में खा पी कर सब लोग आ गये हम लोग सब पालकी में बैठ गये होटल का बिल देने के बाद पुनःयात्रा प्रारंभ हुई ।मुझे पालकी पर थोडा भी आराम नहीं लग रहा था पर बार बार ये सोच सोच कर कि मैं बैठी हूं तो इतनी परेशान हूं और ये लोग जो इतना बोझ लेकर चल रहे हैं वो कितना परेशान हो रहे होंगे।चार कंधे की यात्रा इतनी कष्टप्रद थी कि रास्ते के प्राकृतिक सौंदर्य को देखने की हिम्मत नहीं हो रही ?
एक बारह फीट चौडी सडक उसपर घोडे आदमी पालकी पिटठु सब आ जा रहे थे लगातार पूरा रेलमपेल मची हुई थी ।एक ही धुन थी चलना और चलना।बूढे लोग भी धीरे धीरे कराहते हुए चढाई कर रहे थे।आस्था का सैलाब चल रहा था यमुना दर्शन की धुन लगी हुई थी ।लौटने वालों को देख कर लग रहा था मानों उन्होंने जुग जीत लिया हो ।इस प्रकार सात किलो मीटर की यात्रा में हम लोगों की सवारी तीन चार बार जाते हुए एक दो बार आते हुए रूकी ।दो बार नाश्ता दो बार कुछ ड्रिंक्स दो बार पानी पीने के लिये रूकी ।मुझे तीन चार बार पेशाब के लिये रूकना पडा ।समस्त लज्जा का परित्याग करके मैंने उन लोगों से कहा कि तुम लोग मुझे उतार दो मैं बाथरूम जाऊंगी ।उन लोगों ने कहा यहां कहां है बाथरूम ?मैंने कहा कि मुझे उतार कर थोडा साइड हो जाओ मैं यहीं पर कर लूंगी ।इस तरह तीन चार बार करना पडा था।वाहकों में से किसी एक ने कहा कि माय जी हम लोग तो आपके बेटे के समान हैं मैंने कहा बेटे क्या पोते नातीके समान हो बूढा शरीर हैक्या करूं लाचारी है ।वे सबके सब मेरे प्रति सहानुभूति से भर गये ।ऊपर जाने के रास्ते में सडक के ऊपर कटी हुईपहाडियों के नुकीले कोन लटके हुए थे वाहकों ने बार बार आगाह किया कि देखियेगा मां जी सिर झुका कर चलिये पत्थर से चोट नहीं लग जाये ।इस मार्ग पर यात्रियों को थोडा ध्यान नहीं देने पर चोट लग भी जाती है ।ऊपर चढतेचढते धैर्य छूट रहा था कि अब और कितनी दूर पर दूरी तो थी ही।वहां ऑक्सीजन की कमी भी हो जाती थी मेरे पास ऑक्सीजन का बॉटल भी दे दिया गया था जरूरत पडने पर उपयोग के लिये ।धीरे धीरे मंजिल नजदीक आ रही थी पूरी भीड लगी थी उसी को चीरते हुए हमारी पालकी मंजिल तक पहुंची।ऋचा लोग पहले पहुंच कर हम लोगों का इंतजार कर रही थी ।हम लोग सब एक जगह एकत्र हुए सबको चाय पीने के लिये कहा गया उसके साथ जिसको जो पसन्द था वो लेकर खाया
कुछ ने तो ठंडा भी पिया ।उसके बादकी यात्रा पैदल करनीथी ।वहां से चार पांच बडी बडी सीढियां चढने के बाद दाहिने मुड कर गलीनुमा बाजार में मुड कर जाना था ।मैं दोनों तरफ बच्चों का हाथ पकड कर चढने लगी पर ऊपर चढते चढते मेरी सांस फूल गई थोडा रूक कर
फिर चढने की कोशिश करने लगी पर सांस इतना फूलने लगी कि दम नीचे ही नहीं जा रहा था।लगता था वहीं पर इह लीला समाप्त हो जायेगी ।एक सिपाही ने देखा उसने मुझे रोक कर एक दूकान में बिठा दिया ।
35.क्या हुआ क्या हुआ करके सब लोग वहीं पर आ गये ऑक्सीजन ,पानी .चाय वगैरह देकर मुझे स्थिर किया गया ।थोडी देर के बाद दो सिपाही आये और कहने लगे कि चलिये हम लोग आपको दर्शन करवा दें पर मेरी हिम्मत नहीं हुई यह जान कर कि आगे पैंतीस सीढियां और हैं ।तबियत ठीक होने पर मैंने पतिदेव से कहा कि आप जाकर दर्शन कर लीजिये ये गये भी पर सीढियों तक जाकर लौट आये आकर कहा कि सीढियों तक जाने कि मेरी भी हिम्मत नहीं हुई नीचे से ही प्रणाम करके चला आया ।मन ही मन मां जमुना को नमन करते हुए मैं याद करने लगी कि यमुना दर्शन कब कब हुआ है ।मुझे 75 में मम्मी के साथ दिल्ली वाली यात्रा याद आ गई जब मम्मी के स्कूल की टीचरों के साथ हम लोगों ने दिल्ली ,हरिद्वार ,ऋषि केश,वृंदावन,मथुरा,आगरा ,अयोध्या सब जगह देखा था ।उस बार यमुना में स्नान भी किया था और बृहस्पतिवार की कथा भी उसी प्रकार संगम स्नान के समय नाविक ने दिखाया था कि वो श्यामल रंग की जो धारा आ रही है न वही जमुना जी हैं और आज तो यमुनोत्री में आकर भी मां यमुना का दर्शन नहीं कर पाई ।फिर भाग्यवादी की तरह सोचने लगी कि जितना लिखा है उतना ही न हो सकेगा ?यहां तक आ गई यही बहुत है स्थान तक तो आ ही गई अब मंदिरनहीं जा सकी तो क्या करूं। करीब डेढ घंटे वहां पर बैठी रही वो होटल छोटा ही था ।अट्ठारह लोगों के बैठने कीजगह वहां थी।खाना पीना सब हो रहा था चावल ,सब्जी दाल, चावल ,केअलावे पकौडी ,ब्रैड ,स्नैक्स सब बिक रहा था।मेरे बैठने पर दूकानदार को परेशानी हो रही थी क्यों कि हम लोग दो कुर्सी लेकर बैठ थे पर मानवता के नाते कुछ बोल नहीं रहा था ।फिर सिपाही जी ने मुझे बिठाया था तो भगा भी नहीं सकता था ।मैं वहां का व्यापार देख रही थी।पूरब ,पश्चिम ,उत्तर ,दक्षिण चारो तरफ के लोग आ जा रहे थे सबकी वेश भूषा ,भाषा से राज्यों की विभिन्नता झलक रही थी ।हमारे बच्चे दर्शन करके लौट आये हम लोग चलने को हुए पतिदेव ने सिपाही से कहा ीकि इनकी पालकी यहीं मंगवा दीजिये जिससे आराम से ये जा सकें इतनी दूर भी नहीं चल सकेंगी।फिर सिपाही ने मेरी पालकी दूकानके पास मंगवा दी और मैं अपना ऑक्सीजन सिलिन्डर लेकर पालकी पर बैठ गई।लौटने की यात्रा प्रारंभ करने के साथ ही पालकी पर मेरी सांस फिर फूलने लगी ।भीड भी बहुत थी वाहक लोग किसी तरह ढेलढाल कर चल रहेथे ।मैं लगातारऑक्सीजन लेने लगी इतनी भीड में उतारने के लिये भी नहीं कह सकती थी ॥तीनों पालकियां आगे पीछे चलने लगीं चारों बच्चे भी घोडे पर सवार होकर लौटने लगे मन में यात्रा पूरी होने के उल्लास से ज्यादा मंदिर तक नहीं जाने का संत्रास था।लग रहा थाकि क्या माता रानी यहां तक लाकर थोडा सा के लिये दर्शन नहीं हो पाया फिर अंतर्मन विश्वास दिला रहा था कि यहां तक आये न हो गया दर्शन माता रानी मनोभाव समझती हैं उनको पता है कि पूरे मनोभाव से ये लोग आये हैं अब जान जाने की नौबत आ गई तो क्या करते ।कहा भी गया है “आत्म रक्षतिधर्म “।वैसे भी हमलोग जहां निरूपाय हो जाते हैं तो सारे निर्णय अपनी परिस्थिति के अनुकूल ले लेते हैंऔर तदनुसार ईश्वर को समझा भी देते हैं।
36.उत्तराई की यात्रा चढाई से थोडी आसान लग रही थी।वाहक गण दौडते हुए चल रहे थे।एक बार में चार चार पहाडी मोड को पार कर रहे थे चढने के समय जो जोर लगाना पड रहा था वैसा नहीं था ।लौटते लौटते करीब चार बज गये लौटते वक्त भी दो बार रोका गया एक बार चाय पानी के लिये दूसरी बार खाना खाने के लिये ।वाहकों ने एक रेस्तरॉ के राजमा चावल की इतनी प्रशंसा की कि हम लोगों ने भी सोचा कि हमें खा लेना चाहिये।सबने राजमा चावल खाया पतिदेव ने कहा कि यहां का राजमा चावल इतना बढिया होता है हमें लेकर चलना चाहिये पर खाना खा कर पाया कि हमारे घर पर ही इससे बढिया राजमा बनता है फालतू का सामान ढोने का क्या फायदा ।फिर हम लोगों ने वो विचार त्याग दिया ।दुबारा पालकी पर बैठने के पहले सब लोग लघुशंका से निवृत्त होने में लगे पतिदेव होटल के पीछे जहां पर घोडे आराम कर रहे थे उधर निकल लिये कि संयोग से एक घोडे ने थोडी टक्कर मार दी और वो उधर खाई में गिरते गिरते बचे ।एक वाहक ने इन्हे पकड लिया था जान बच गई इधर आकर जब उन्होंने बताया तो अमृतांशुको बहुत गुस्सा आया ।डांटते हुए उसने कहा कि क्या आप बच्चों की तरहइधर उधर निकल जाते हैं उतना किनारे पर जाकर पेशाब करने की क्या जरूरत थी अभी कुछ हो जाता तो घर जाकर हम लोग सबको क्या मुंह दिखाते ।
37.आप ग्रुप में ही रहिये मां लोगों के साथ ।पति देव भी तो घबराये हुए थे बोले कि ठीक कहते हो अगर वो आदमी पकड नहीं पाता तो कुछ भी हो सकता था मैं खाई में गिर ही जाता ।फिर हम सब अपनी अपनी सवारी पर सवार होकर चले ।शिवम परम तो घोडे पर ऐसे चल रहा था मानों बचपन से घुडसवारी ही करता रहा हो ।एक बादशाही ठाठ वाले राजा की तरह ।नीचे आते आते दूर से ही बस स्टैंड दीखने लगा था ।लगता था अब आ गया अब आ गया पर दूरी तो थी ही ।खैर किसी तरह चलते चलते हमारी सवारी बस स्टैंड तक आ गई।हमारी गाडी वाला ड्राइवर गाडी के साथ वहीं खडा था ।हम सब लोग उतर कर एक दूकान पर बैठे मैंने अपनी छडी की खोज शुरू की कि किस दूकान पर मेरी छडी रखी हुई है पर किसी दूकान दार नें स्वीकार नहीं किया असल में जाने समय जितने लोग आगे पीछे कर रहे थे वो अब कहां मिलते हमारे वाहक लोग भी पेमेंट लेने तक रूके थे कोई छडी खोजने में रूचि नहीं ले रहा था ।संतोष कर लेना पडा कि छडी खो गई है सब वाहकों को पेमेंट से दो दो सौ रूपये अधिक देकर हम लोग गाडी पर बैठ गये।अब हमें नींव करौली बाबा के कैंची धाम जाना था ।कैंची धाम नैनी ताल के पास है और रास्ते में देहरादून ,मसूरी जैसे जगह हैं पर उससे पहले तो हमें वार कोट पहुंचना था जहां से हम चले थे ।लौटने वक्त फिर वही मार्ग था ढेरों ट्रैफिक ,जाम ,घंटो रूके लोग धीरे धीरे मार्ग साफ हुआ और आगे बढे ।हम सुबह पांच बजे के निकले लोग शाम होते होते बार कोट लौट आये ।इस बार यहां टेंट में जगह मिली ।गाडी से उतर कर लाइन से लगे तीन टेंट में एडजस्ट हो गये ।विचार हुआ कि खाना पीना करके जल्दी आराम करना है चारो धाम यात्रा संपन्न हो चुकी थी अब घर की तरफ निकलना है ।
दूसरे दिन नाश्ता पानी करके हमलोग निकले।पर एक मुसीबत झेलने के बाद ।हुआ ये कि अमृतांशु का पेट गडबड हो गया था ।सुबह से पॉटी जाने की रफतार तेज हो गई थी कमजोरी भी लग रही थी इसी लिये सुबह सुबह निकलने का कार्यक्रम रद्द करके ये सोचा गया कि थोडा ट्रीट मेंट हो जाये नक्स वगैरह खाकर थोडा हल्का फील करने लगे तो निकला जायेगा ।बाकी सब लोग तैयार होने लगे नाश्ता पानी भी हो गया जितनी दवा पास में थी उतने का प्रयोग किया गया दो तीन बार पॉटी जाने के बाद उसका मन थोडा ठीक हुआउसने महसूस किया कि अब चला जा सकता है ।
38.चार धाम की यात्रा ——-आगे
ये सब होते होते करीब नौ बज गये उसके बाद भारी मन से आशंका भरे ह्रदय से हम लोग चले क्योंकि हमारे ग्रुप का लीडर ही बीमार पड गया था ।आशंका इस बात की थी कि कहीं ज्यादा तबियत खराब न हो जाय।वहां से चलकर हम लोगों को देहरादून रूकना था यानी पहाडी मार्ग पार करके नीचे शहर की तरफ जाना था ।मार्ग में एक शहर का बाजार मिला वहां रूक कर हम लोगों नें नॉर फ्लाक्स टेबलेट ,फल एवं कुछ स्नैक्स वगैरह लिये ऋचा उतर कर सब ले आई ।दवा वगैरह सब खा कर अमृतांशु गाडी के पीछे सीट पर जाकर लेट गया अभी लम्बी दूरी तय करनी थी।देहरादून पहुंचते पहुंचते रात होने वाली थी ।अचानक गाडी रूकवानी पडी अमृतांशु को नेचर कॉल के लिये जाना था हम लोग चिंतित हो गये कि अब क्याकिया जाय होटल तो वहां बुक है यहां क्या हो ?हमलोगों ने सोचा कि अगर नजदीक में कोई जगह रूकने को मिल जाये तो वहीं रूका जाये देहरादून कल जाया जायेगा ।वहां नेट का प्राब्लम था किसी का फोन नहीं चल रहा था सिर्फ जिओ चल रहा था वो सिर्फ मेरे फोन में था ।अमृतांशु मेरे फोन से सर्च करने लगा सर्च करते करते मसूरी में ही एक जगह मिली बात चीत हुई और तीन कमरे भी मिल गये।विश्राम की आवश्यकता देख कर मसूरी में ही रूकने का प्रोग्राम बना ।हम लोगों को लगा कि मसूरी नजदीक होगा पर नहीं उसकी दूरी भी कम नहीं थी ।मुख्यमार्ग को छोड कर हमारी गाडी मसूरी की तरफ पहाडी क्षेत्र में मुड गई ।पहले रूकने की बात पर हम लोग प्रसन्न थे वैसे नौ बजे दिन से करीब तीन चार बजे तक सात आठ घंटे की यात्रा हम लोग कर चुके थे थोडा पहले रूकने की बात सुखद लग रही थी खास कर अमृतांशु के लिये कि थोडा आराम कर लेगा तो ठीक हो जायेगा ।पहाडी मार्ग पर सात आठ किलो मीटर चलने के बाद होटल की सीमा आ गई ।दो किलो मीटर पहले से नाका वंदी की गई थी सीधे रोड से जाने के बाद होटल था बाई तरफ से थोडी ढलान वाली कच्ची सडक घूम कर होटल जाती थी ।पुलिस का पहरा भी था ।उन लोगों ने सीधी सडक से जाने के लिये मना किया कि इधर से जाओगे तो जाम लग जायेगा ।ड्राइवर इसके लिये तैयार नहीं था उसका कहना था कि बहुत घूमना पड जायेगा ।सिपाहियों ने ये भी कहा कि यात्रियों को यहीं उतार कर तुम खाली गाडी लेकर चले जाओ ।अब यात्रियों में मैं भी थी जो पच्चीस पचास कदम चलने में ही पस्त हो जाती थी ह्वील चेयर भी नहीं था बताया गया कि सिनियर सिटीजन हैं जाने दो पर पुलिस टस से मस नहींहुई ।फिर अमृतांशु ने होटल के मालिक को फोन किया कि हम लोग पहुंच तो गये हैं पर दो किलो मीटर पहले पुलिस ने रोक लिया है मेरे साथ सिनियर सिटीजन हैं तीन तीन दो किलोमीटर पैदल नहीं जा सकते हैं।होटल मालिक ने भी पुलिस से बात की बात नहीं बनी तो उसने अमृतांशु को फोन करके कहा कि आप लोग वहीं रूकिये मैं स्वयं आता हूं ।थोडी देर में वो अपनी बडी सी गाडी लेकर आ गया ।उसकी गाडी पर प्रतिबंध नहींथा बोला आप लोग मेरे अतिथि हैं मैं ले आऊंगा ।इधर ड्राइवर से थोडी झडप भी हो गई बात नहीं मानने को लेकर खैर गाडी आई हम सब शिफ्ट हुए सीधे रास्ते से चल कर होटल की ओर चले ।ड्राइवर खाली गाडी लेकर कच्चे रास्ते से होटल की ओर चला।होटल का मालिक व्यवहार कुशल व्यक्ति था ।उसने महसूस नहीं होने दिया कि वो व्यापारी है ।हमें लग रहा था कि हम लोग अपने रिश्तेदार के यहां आये हैं ।माता जी ऐसे बैठिये यूं वेल्ट लगा लीजिये आपको आगे बैठने में आराम होगा वहीं बैठिये ,मैं ए सी चला देता हूं आप लोग पसीने से परेशान हैं इत्यादि ।
39.होटल तक पहुंच करउसने दरबान से दो गेट खुलवाये और अपने घर जाने के मार्ग से गाडी अंदर ले गया ।मैंने पूछा कि आपके होटल जाने के लिये सीढियां तो नहीं चढनी होंगी ?क्योंकि होटल ऊपर पहाडी पर था गाडी को बहुत ऊंचाई ूतक ले जाना पडा था ।उसने कहा सीढियां हैं आठ दस छोटी छोटी आपको परेशानी नहीं होगी ।स्टाफ हैं पकड कर ले जायेंगे ।उनका होटल थोडा सीधी चढाई पर था वैसे रास्ते पर कोई कुशल चालक ही गाडी चला सकता था उसने कहा आंटी आप डरिये नहीं हैंडिल कस के पकड लीजिये आपको कुछ नहीं होगाऔर कुशलता से सीधी चढाई पर गाडी लेकर आ गया ।गाडी से जहां उतरे वहां से पांच छे सीढियां चढने के बाद आठ सीढियां उतरना था तब होटल के कमरे थे ।एक लेडी स्टाफ ने आकर मेरा हाथ पकड कर कमरे तक पहुंचा दिया ज्यादा परेशानी नहीं हुई।होटल मालिक ने बताया कि मेरे पास देशी गाय,मु्र्गी ,बकरा सब है आप लोगों को अपनी गाय के दूध के साथ हल्दी मिला कर पिला दूंगा आप लोग आराम महसूस करेंगे।हम लोगों ने कहा कि दूध की जरूरत नहीं है आप हमें अच्छी सी चाय पिला दीजिये थोडा आराम करेंगे तो ठीक हो जायेगा ।उसकी पत्नी भी मिलने आईथी।बहुत सुन्दर सुसंस्कृत वेशभूषा एवं भाषा भी।उसने बताया कि यहां स्टॉफ तो हैं पर भोजन मेरी देख रेख में ही तैयार होता है आप लोग खाकर देखेंगे ।यानी बहुत सुखद घर वाला वातावरण था ।होटल उतना ही सुन्दर था तीन कमरे लिये गये थे 14/24 का कमरा एक लाइन से तीनों कमरे थे उससे लगा हुआ छे फीट चौडा लम्बा सा वरामदा था वरामदे के किनारे खूबसूरत महंगी लकडी की रेलिंग एवं छत थी बीच बीच में मोटे मोटे खम्भे नक्काशी दार वहां बेंत की कुर्सियां रखी हुई थीं गोल गोल टेबुल बच्चे सब वहां पहुंचते ही किलकारी मारने लगे इतनी सुन्दर जगह मजा आ गया अगर पापा की तबियत खराब नहीं होती तो ये देख ही नहीं पाते ।सामने ऊंचे ऊंचे पहाड ,पहाडियां ,जंगली पेड ,झाडियां,कच्ची पक्की सडक तरह तरह के फूल यानी प्रकृति अपने समस्त वैभव के साथ इठलाती हुई बिखरी थी ।कमरे के किनारे किनारे हाई क्वालिटी का गद्दे दार सोफा लगा था और बीच मेंएक लम्बा चौडा डबल बेड का पलंग मोटे गद्दे सफेद चादर ,तकिया,बेडकवर पलंग के दोनों ओर साइड टेबुल था जिस पर लटकता हुआ लैंप शेड रखा था और भी सुन्दर कलाकारी वाली वस्तुएं रखीं थी ।दरवाजे से घुसते ही बाईं तरफ एक दरवाजा था जिसके पीछे समस्त आधुनिक संसाधन से युक्त 5/8फुट का बाथरूम था जहां एक कुर्सी भी रखी हुई थी ।वाशवेशिन,कमोड,बाल्टी मग,नल ,टावेल,ब्रश पेस्ट ,साबुन शैम्पु के साथ साथ भीनी भीनी सुगंध ।एक ही नजर में मुझे कमरा इतना पसंद आया कि मैंने पतिदेव से कहा कि हम लोग जो फार्म हाउस बनाना सोच रहे हैं उसमें ये डिजायन भी अच्छा रहेगा ।दरवाजा महंगी लकडी से बना नक्काशी दार था वरामदे के छज्जे भी मेहराबदार डिजायन वाले थे।
मैं अपनी समधिन के साथ बाहर वरामदे पर विराज गई संध्या वेला थी बादल भी घिरे हुए थे दायें ओर पूरब था बाईं ओर पश्चिम सामने फैला हुआ पहाड पहाडियां फूल पौधे,अनेक प्रकार की झाडियां ।फिर होटल मालिक ने आकर कहा कि सबसे पहले मैं आप लोगों को यहां के प्रसिद्ध फल बुरांस का रस पिलाऊं जिससे आपकी थकान दूर हो जायेगी शरीर में ठंडक पहुंचेगी ? जीवन में पहली बार बुरांस का रस पीने का अवसर मिल रहा था यात्रा संस्मरणों में इसका नाम तो सुना था पर पीने का अवसर नहीं मिला था।हम लोग जगह की सुन्दरता से प्रभावित थे पैसों की चिन्ता नहीं हो रही थी कि बिना मतलब दो दिन रूकने से खर्च बढ जायेगा ।चाहे जिस भी कारण से रूके थे यहां का अनुभव अनोखा था एकदम नया अछूता ।अगर नहीं आते तो ये अनुभव नहीं ही प्राप्त करते ।होटल के दो वेटर आये उन्हों ने वीच में गोल मेज लगा दिया चारो तरफ कुर्सियां यानी दो गोल मेज आठ कुर्सियां लग गईं हमलोग सात जन थे सब अपनी अपनी जगह पर बैठ गये ।सात डिजायन दार शीशे के ग्लास में गाढे गुलाबी रंग का बुरांस का जूस आया और प्लेट में दो तीन तरह का विस्कुट मिक्सचर वगैरह।सबलोग इस अद्भुत पेय का आनंद लेने लगे जगह और पेय की भूरी भूरी प्रशंसा हो रही थी सबसे ऊपर होटल वाले का आचरण भी अचंभित कर रहा था ।इतनी बडी प्रोपर्टी का मालिक जो लाखों रूपया रोज कमा रहा है वो अपने व्यवहार में इतना विनम्र ,सहज,मिलनसार और मजाकिया है एक छोटे बालक की तरह ऐसे व्यक्ति से मिलना भी एक भाग्य की बात है।इससे पता चलता है कि अगर आप बहुत ऊपर जा कर भी अपने व्यवहार में शालीन रहते हैं तो आप एक विशिष्ट व्यक्ति हैं।जूस पीने के बाद हम लोगों ने चाय की इच्छा जाहिर की थोडी ही देर में चाय भी आ गई प्लेट के साथ महंगे कप में।कुछ चिप्स वगैरह भी मंगवाया गया खा पी कर आराम करने कमरे में गये ।वेटरों को रात का मीनू बता दिया गया दो तरह का चिकन दो तरह की सब्जी , दाल चावल ,सलाद,दही वगैरह ।सबलोग अपने अपने विस्तर में दुबक गये।पहाडी वातावरण में कब वर्षा हो जायेगी पता नहीं चलता है ।हमलोग कमरे में आये ही थे कि वर्षा होने लगी ।छोटे छोटे ओले पट पटापट कमरे की छत पर गिरने लगे ।आधे घंटे तक खूब झमाझम बारीश हुई।कमरे से वरामदे पर निकलने वाला दरवाजा शीशे का था उस पर भारी परदा लगा हुआ था परदा हटा कर वर्षा के सीन को आराम से देखा जा सकता था ।हम सब प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत थे ।कल्पना कर रहे थे कि अगर नहीं रूकते तो अभी वर्षा में भींग ही रहे होते ।यहां रूक कर अच्छा ही किये मसूरी देखे बिना मसूरी से जा रहे थे ।मसूरी सुन्दर जगह है देखने के लिये ।मैंने पतिदेव से कहा कि मन करता है कि एक दो महीने यहां आकर रहूं प्रकृति की गोद में प्रकृति का आनंद लेते हुए जीवन गुजारूं ।पर जगह तो बडी महंगी है दस हजार रोज ।पतिदेव ने कहा कि मन करने से क्या होता है ऐसा कर नहीं सकते हैं न।दो दिन आनंद ले लो वही अच्छा है ।
रात्रि का भोजन भी बहुत स्वादिष्ट था कुछ चीजों में मिर्च था जिसे बच्चों ने नहीं खाया पर बाकी लोगों ने पूरा आस्वादन किया ।बहुत देर तक कुर्सी पर बैठे आकाश के तारे ,पहाड,पहाडों पर बने घरों की रोशनी देखते रहे ।ऐसा लग रहा था कि स्वर्ग की कल्पना साकार हो गई हो ।जरूर किसी जन्म में कोई पुण्य किये होंगे जो ऐसी जगह देखने का अवसर मिला।पहुंची तो थी ऋचा अमृतांशु के जिद के कारण पर लगता था कि सारे बच्चे अगर यहां होते तो कितना आनंद आता ।अपनी अनुभूति से सबको अनुभूत करवाना चाह रहे थे।यात्रा संस्मरण लिखने का एक कारण और है अपनी अनुभूति को व्यापक प्रसार देना ।जैसा अनुभव कर रही थी वैसा हूबहु शब्दों मे उतार पाना तो संभव नहीं है पर जितना उतार पा रही हूं उसमें उन क्षणों को जी ही रही हूं।
40.मोटे ऊंचे लचीले गद्दे पर सोने में आराम तो नहीं लग रहा था क्योंकि उतने गुलगुले गद्दे पर सोने की आदत नहीं थी लेटते ही लगता था कि धंस गये करवट लेने में भी तकलीफ हो रही थी ।मैं सोच रही थी कि ये लोग कर्ल ऑन के कडे गद्दे क्यों नहीं रखते हैं ये गुल गुले गद्दे कमर पीठ में दर्द वाले लोगों के लिये कष्टकारी है ।पर इसके वावजूद जोकुछ सकारात्मक दीख रहा था उसकी प्रशंसा किये बिना नहीं रह रही थी ।लगता था कि समय को बांध लूं येसुखद क्षण धीरे धीरे बीते ।
दूसरे दिन सबेरे सबेरे हम लोगों के उठने के पहले समधिन वरामदे में टहल रही थीं ।हम लोग उठ कर बाहर गये फिर सबने मिलकर चाय पी सुबह सुबह पूरा सामने का परिसर नहाया हुआ लग रहाथा एकदम फ्रैश ठंडी ठंडी हवा उस मई महीने में और झीनी झीनी सुगंध ।वेटर ने आके पूछा कि नाश्ता नीचे करेंगे कि यहीं ऊपर में ।सबलोग नीचे भीदेखना चाह रहे थे इसीलिये नीचे होटल के कैंन्टीन में गये मैंने अपना नाश्ता कमरे में ही मंगवा लिया था।आलु पराठा ,दही,सब्जी,उबले अंडे ,चाय बहुत कुछ था कुछ फल भी
मैंने समय पर नाश्ता कर लिया अब विचार होने लगा कि आज चला जाय कि कल ।मैंने कहा कि तबियत अगर ठीक नहीं हुई है तोरूक जाना ही ठीक होगा तय हुआ कि आज भर आराम कर लेना चाहिये ।आज भर आराम करने के लिये रूके तो सही पर शाम होते होते शिवम की तबियत खराब हो गई ।वही पेट खराब अब सब लोग उसकी सेवा में लगे नक्स वगैरह दिया गया होटल वाले से कह कर दवा मंगवाई गई हाथ पैर में तेल लगाया गया कि ठीक हो जाये कल निकलना है ।मसूरी का प्रसिद्ध मार्केट वहीं नजदीक में था अमृतांशु ,ऋचा,परम सब घूमने गये कुछ कुछ खरीदा भी गया ।उसमें सबसे जरूरी चीज खरीदी गई मेरी छडी जो यमुनोत्री मार्ग में ही किसी होटल में छूट गई थी।ये वेंत की छडी थी नुकीली छोर वाली ये तीन स्टैंड वाली छडी जितनी आराम दायक तो नहीं थी पर नहीं मामू तो काना मामू कीतरह तो थी ही ।दिन का खाना सबके तबियत के अनुकूल मंगवाया गया ।शिवम के लिये गीला चावल ,आलु का चोखा ,घी बाकी लोगों के लिये दाल सब्जी चिकन अंडे जिसको जो मन सब लाया गया ।तय हुआ कि कल सुबह चार बजे हमलोग निकल जायेंगे नैनीताल के लिये ।दूसरा दिन भी वहींवरामदे पर सुन्दर दृश्य देखते हुए बीता ।
41.उगने वाले सूर्य के सौंदर्य के साथ साथदोपहर एवं संध्या बेला के सूरज का सौंदर्य आंखों से पिया गया ।नाश्ता चाय भोजन और आराम सुन्दर सबकुछ सुन्दर था ।होटल मालिक ने अपने अनुचरों को कहा कि इन लोगों का सामान रात में ही इनकी गाडी में रख दो जिससे सुबह सुबह तुमलोग नहीं रहोगे तो परेशानी नहीं होगी ।हम लोगों ने अपने वो कपडे जो सुबह सुबह पहनने थे पास में रख लिये बाकी सब पैक करके बक्से में रखवा दिया ।आधी तैयारी हो चुकी थी होटल मालिक ने सुबह तीन बजे ही घंटी बजा कर चाय भिजवा दिया कि अब आप लोग तैयार हो जाइये ।हम सब जल्दी जल्दी स्नान ध्यान करके तैयार हो गये ।होटल मालिक अपनी कार लेकर आये कि मैं अपनी गाडी से आप लोगों को ऊपर पहुंचा देता हूं क्योंकि आपकी ट्रैवलर गाडी शायद इतनी खडी चढाई पर नहीं चढ सके ।मैंने स्थान देवता को प्रणाम किया सुखद अनुभूति देने के लिये धन्यवाद दिया फिर रेलिंग पकड कर कुछ सीढियां चढने लगी ।होटल की स्टाफ जो बीस पच्चीस वर्ष की लडकी होगी उसने मुझे सहारा दिया और सीढियों का मार्ग कट गया ऊपर आते ही होटल के मालिक ने कार के आगे का दरवाजा खोल कर मुझे बैठने को कहा।उसने कहा कि चलिये मां जी आपको आपकी गाडी तक पहुंचा देता हूं।गाडी में मैं ,पतिदेव ,समधिन,और बच्चे सब बैठ गये ऋचा अमृतांशु पैदल ही ऊपर चढे ।ऊपर ड्राइवर ट्रैवलर लेकर तैयार था हम सब अपनी गाडी में बैठ गये होटल मालिक को धन्यवाद कहा और नैनी ताल का सोच कर चले ।अब मसूरी के पहाड से उतराई का मार्ग था उतरते उतरते पहले देहरादून जाना था अब वहां रूकना नहीं था सीधे सीधे चलते ही जाना था पर अबकि ऋचा के पेट दर्द हो रहा था हल्का हल्का और आगे बढते बढते दर्द बढ ही जा रहाथा ।जितनी दवाइयां हमारे पास थीं वो सब दे दिया गया किन्तु थोडी थोडी देर में टीस मारने के कारण वो परेशान हो गई थी ।हम लोग भी परेशान थे कि इतनी दूर जाना है ज्यादा खराब हो गई तो क्या होगा?वही सबको संभाल रही है ।
42.एक दो जगह दवा और डॉ के बारे में पूछने के बाद अमृतांशु एक अस्पताल में गाडी ले गया ।वहां ऋचा को दिखलाया गया।वहां उसका ट्रीटमेंट शुरू हुआ ।डॉ ने डिहाईड्शन से बचने के लिये पानी चढाने की सलाह दी ।करीब दो घंटे तक पानी चढाया गया ।हमलोग गाडी में बैठे रहे ऋचा को पानी चढता रहा।दो बोतल चढने के बाद ऋचा ने कहा कि अब वो ठीक है चल सकती है ।हम लोग घबडा कर कैंची धाम यात्रा को स्थगित करने की सलाह देने लगेथे कि चलो अब लौट चलते हैं पर ऋचा लौटने के लिये तैयार नहीं थी ।उधर डॉ भी दो घंटे और रूक कर पानी चढाने की बात कर रहीथी पर ये लोग उसके लिये भी तैयार नहीं हुई ।डॉ बोली कि आपलोग अपने रिस्क पर लेकर जा रहे हैं तो ऋचा ने कहा कि रिस्क ही सही हम अपने रिस्क पर चले जायेंगे और करीब तीन घंटे बाद हमारी गाडी देहरादून के अस्पताल से कैंची धाम की ओर चली।दूरी अच्छी थी और गाडी भी अच्छी थी और सबसे ज्यादा अच्छा था मन का संकल्प कि कैंची धाम जाना है तो जाना है तबियत का क्या वो तो अच्छी खराब होती रहती है ।अब रास्ता पहाडी नहीं था शहर की सडकों पर चल रहे थे ।वहीं किसी एक जगह रूक कर हमलोगों ने पकौडे और चाय का आनंद उठाया और आगे की तरफ बढे।कितना किलो मीटर बाकी है ये जानने के बादभी मुझे लग रहा था कि अब आ जायेगा अब आ जायेगा ।पर आये कैसे दूरी तय होगी तभी नआ सकता है ।कितनी पहाडी और नजाने कितने मोड पार करके हम लोग करीब साढे तीन बजे कैंची धाम वाले होटल तक पहुंचे।होटल का नाम था विजय होटल उसका पता बहुत बार इधर उधर पूछना पडा ।बहुत घुमाव दार रास्ते पर चलने के बाद होटल का पता मिला ।होटल में जाने के लिये यहांभी ऊंची चढाई थी पूरी सीधी चढाई ।वहीं नीचे हमलोगों को उतारा गया और करीब पचास साठ कदम चढने का भगीरथ प्रयास प्रारंभ हुआ।बाकी लोग तो चढ गये पर मुझे छडी रहने के बाद भी दो आदमी पकड कर चढाने लगे।उतने में ही मेरी सांस फूलने लगी थी ।बहुत मशक्कत के बाद ऊपर चढ पाई ।ऊपर चढने के बाद मेरा स्वागत एक बूढे व्यक्ति ने किया वो शायद मालिक था।उसने मेरी हालत देख कर आश्चर्य किया कि इतना अशक्त कैसे हो गईं मैं तो अभीतक फिट हूं।वहां कुर्सी पर बैठ कर मैंने कहा कि मेरा भोग है भगवान की मर्जी है कि मुझे ऐसे चलना है।थोडी देर बैठने के बाद वेटरों ने मुझे भी पकड कर दो मंजिले पर स्थित मेरे कमरे मे पहुंचा दिया ।कमरा अच्छे ढंग से सुसज्जित था बेड कुर्सी शोफा टेबुल ,लैम्पशेड,बाथरूम सबकुछ मार्बल भीबहुत सुन्दर था।सामने की वरामदा भी रंगीन टाइल्स से सजा हुआ था सबसे बडी बात थी कि वहां से मंदिर का दर्शन किया जा सकता था ।
एक निश्चित स्थान मिल जाने के बाद जो शान्ति की अनुभूति होती है वो होने लगी ।ऐसा प्रतीत हुआ किअब रात भर आराम करेंगे ।करीब तीन बज रहे थे हम लोगों ने खाना मंगवाया होटल में खाना खत्म हो गया था फिर भी उन लोगों ने प्रयास कर हम लोगों के लिये खिचडी दही का इंतजाम किया स्वाद में तो ठीक था पर मात्रा में बहुत कम ।एक एक कटोरी खिचडीदही खाकर हम लोग विश्राम करने लगे।उन लोगों ने बताया कि शाम आठ बजे मंदिर में आरती होगी आप लोग चाहें तो जा सकते हैं।मैंने तो मना कर दिया कि मैं तो एक बार ही जाऊंगी कल सुबह अभी फिर उतरने की हिम्मत नहीं है।सब लोग अपने अपने कमरे में लेटने चले गये यात्रा से थका शरीर हिलना डुलना भी नहीं चाह रहा था यात्रा के आनंद की कहानी कहते कहते हम दोनों नींद में आ गये।तीन चार घंटे सोने के बाद ऋचा ने चाय मंगवाया और हम लोगों को उठाया।बाहर आकर देखा तो अंधेरा छा गया था मंदिर से घंटे की ध्वनि आरही थी।
जितनी दूर तक पहाडी दृश्य दीख रहा था मनोरम था मंदिर की जो दिशा बताई गईथी उसी ओर प्रणाम कर रही थी क्योंकि दीख नहीं रहा था रात्रि भोजन के लिये विशेष भोजन सामग्री का आदेश दिया गया ।पराठा ,चावल,दाल ,सब्जी,नूडल्स,सलाद आदि।वैसे तो तीन तीन कमरे बुक किये गये थे लेकिन भोजन एक ही कमरे में रखवाया गया क्यों कि सब लोग एक साथ खा सकें ।नीचें होटल वालों ने अच्छे से ढक्कन वाले वर्तन में भोजन सर्व किया था ।ऋचा ने सबका भोजन प्लेट में निकाल निकाल कर खिलाया ।दोपहर में जो कटमट हुआ था खिचडी में उसके विपरीत ढेर सारा खाना बच गया ।हम सब दस बजे तक खा पी कर अपने अपने कमरे में आ गये ।वेटरों ने समधिन के कमरे की सफाई की ।फिर सब आराम से सो रहे।
44.सुबह नीव करौली बाबा के मंदिर में दर्शन करने जाना था ।कहा गया कल सबेरे तैयार हो जाइयेगा सात बजे मंदिर जाना है।सुबह सब लोग तैयार होने लगे चाय वगैरह भी समय से आ गई ।स्नान ध्यान के साथ साथ सामान भी समेटना था क्योंकि प्रोग्राम था कि एक ही बार में सामान के साथ उतर जाना है जिससे दुबारा सीढी नहीं चढना पडे ।मैं पहले नहा धो कर तैयार होकर पतिदेव का इंतजार करने लगी ।करीब आठ बजे तक होटल का स्टॉफ लोग आया उसके साथ सामान सब नीचे भेजा जाने लगा ।हमलोगों की गाडी थोडी दूर पर रखी गई थी ड्राइवर को गाडी लेकर आने के लिये बोला गया जिससे सामान गाडी में रखा जा सके ।मैं फिर हिम्मत करके सीढी से नीचेउतरने लगी।दो लोगों की सहायता से नीचे उतर कर एक कुर्सी पर बैठ गई।अब सपाट ढलान से उतर कर सडक पर जाना था ।इसी समय होटल के मालिक के लडके ने कहा कि मैं भी मंदिर जा रहा हूं आप यहीं मेरी गाडी में बैठ जाइये दर्शन के बाद अपने टेम्पु ट्रैवलर में बैठियेगा ।मुझे लगा कि चलो इतना आराम तो हुआ ।मैं और समधिन गाडी में बैठ गये ।बाकी सबलोग पैदल ही चले।थोडी ही दूर पर मंदिर था ।वहां हमलोगों को उतार कर गाडी लौट गई ।सामने मंदिर देख कर मैं अभिभूत हो गई ।मंदिर जाने
केलिये पच्चीस तीस सीढियां थीं पर रेलिंग भी था उसी को पकड पकड कर मैं उतरने लगी ।करीब सौ कदम चलने के बाद मंदिर का प्रवेश द्वार आया ।चलने में परेशानी तो हो ही रही थी दिमाग में था कि कहीं से ह्वील चेयर मिल जाता तो आराम हो जाता।अंदर जाने के बाद पता करने पर एक ह्वील चेयर मिला भी पर वो पुराना था सीट फटने फटने को था ।उस पर काठ का टुकडा रख कर मुझे बिठाया गया ।सब लोग आ ही गये थे हम लोग बाबा नीवकरौली के मुख्य मंदिर के पास पहुंच गये।वहां अच्छी खासी भीड थी ।कुछ दैनिक पूजा जैसा कार्यक्रम चल रहा था सबलोग उसी के दर्शन के लिये जुटे थे।मेरा चेयर भी वहीं जाकर रूक गया ।दस पन्द्रह मिनट इंतजार करने के बाद पूजा संपन्न हुई सब लोग बारी बारी से अंदर जाकर मूर्ति का स्पर्श कर नमन करने लगे।अमृतांशु वहां चढाने के लिये कम्बल लाया था उसने जाकर चढा भी दिया पर हमलोगों की सोच के विपरीत पुजारी जी ने कम्बल लौटा दिया कि बाबा को चढ गया अब आप लोग अपना अपना कम्बल ले जाइये।हमलोगों को थोडा दुख हो रहा था कि कम्बल चढा नहीं पाये ।
45.फिर ये सोच कर संतोष कर लिये कि चलो उनके नाम का कम्बल हमलोगों के पास रहेगा ।बाकी सारे मंदिरों में दर्शन के बाद जब मुख्य गेट पर आये तो प्रसादमें उबला हुआ चना मिला जो खा लेना था ।हम लोग खा पीकर वहां से निकलने लगे ।गेट के दाहिनी ओर कुछ अन्य भगवान की मूर्ति थी जहां अखंड कीर्तन चल रहा था।वहां प्रणाम करते हुए हमलोग निकल गये ।मंदिर के अंदर करीब एक घंटे का समय हमलोगों ने बिताया ।
ह्वील चेयर से मैं सीढी तक आ गई उसकेबाद शिवम चेयर मंदिर में लौटाने केलिये गया ।सीढी पर चढने के क्रम मेंएक विचित्र घटना घटी ।मेरे पीछे पीछे एक सांढ सीढी पर चढ रहा था ।उसे देख कर मेरे तो होश उड गये हालांकि वो अपने रास्ते जा रहा था उसने मुझे देखा भी नहीं था पर मैंने तो देख लिया था।मैं लंगडे पांव से ही सही इतनी तेज चलने लगी कि ऋचा परेशान हो गई।वो ही मेरे साथ थी जल्दी जल्दी ऊपर चढ करएक दूकान के पास जाकर खडी हो गई।
उधर मेरे पतिदेव उस सांढको सींग से पकडकर साइड करने की कोशिश करने लगे।अमृतांशु पीछे जोर ले चिल्लाया पापा क्या कर रहे हैं?वो भडक जायेगा तो हम सब परेशान हो जायेंगे।फिर वहां के लोकल लोगों ने सांढ को ऊपर चढने के बाद दाहिनी तरफ भेज दिया ।मेरी सांस में सांस आई।वहां कुछ कोल्ड ड्रिंक स्नैक्स वगैरह मिल रहे थे कुछ कुछ लेने के बाद हमलोगों ने ड्राइवर को बुलाया और खाने पीने का सामान लेकर टैम्पु ट्रैवलर में बैठ गये।बाबा नीव करौली को बारम्बार प्रणाम करके हमलोगों ने प्रस्थान किया।अब हमारी यात्रा वापस लौटने की थी ।हमें देहरादून जाकर प्लेन पकडना था वंगलोर के लिये ।कैंची धाम से देहरादून एयर पोर्ट तक सात आठ घंटे की यात्रा थी ।सब लोग प्रसन्नचित्त ठंडी हवा का आनंद लेते हुए थोडा ऊंघते थोडा जगते हुए जा रहे थे ।अपने पास घर का बनाया नमकीन मीठा जो कुछ था सब रख लिया गया था जिससे रास्ते में रूकना ना पडे।खाते पीते चलते चलते हम लोग पहुंच जायें ।रास्ते में थोडी भीड थी पूछने पर पता चला किऊपर भगवान शिव का मंदिर है आज के दिन कुछ विशेष पूजा होती है इसी लिये भीड है ।ऋचा ने पूछा कि चलोगी ऊपर मैंने प्रणाम कर लिया कि बाबा को यहीं से प्रणाम करती हूं जाने में तो अशक्त हूं।वहां पर दूकान थी जहां पर तरह तरह का जूस मिल रहा था ।जूस के बारे में बताया कि ये यहीं की किसी जडी बूटी का है और पेट के लिये बहुत अच्छा है ।हम लोग हल्ला मचा रहे थे कि जूस वगैरहछोडो पर ऋचा ने कहा कि मैं तो पिऊंगी तुमलोग नहीं पीना फिर उसको जूस इतना अच्छा लगा कि उसने हमे भी चखाया फिर सब लोगों ने जूस पिया ।वहां से भी कुछ फल ,कोल्ड ड्रिंक्स लेकर हमारी गाडी चली ।हम लोगों ने अपनी यात्रा 9मई 2022 को प्रारंभ की थी आज 21 मई हो गया था करीब बारह तेरह दिन यात्रा में रहने के बाद हम घर लौटने जा रहे थे ।अब यहीं से घर पर जाकर आराम करने की कल्पना हिलोरें मार रही थी ।ऋचा बोल रही थी कि तुम बोल रही थी कि नहीं जायेंगे नहीं जायेंगे किन्तु आई तो कितना मजा आया ।चारो धाम की यात्रा भी हो गई और तफ.रीह भी ।मैंने कहा कि परेशानी तो हुई पर आनंद भी आया जहां का कभी सोचते भी नहीं थे नाम से ही डरते थे बद्रीनाथ ,केदारनाथ वगैरह का वहां का दर्शन कर आये ये ईश्वर की ही कृपा थी ।
46.आज उस टैम्पु ट्रैवलर के ड्राइवर को छोडने का दिन भी था जिसने हमलोगों को 12.5.22को अपनी गाडी में बिठाया था ।उसका पेमेंट वगैरह तो उसकी संस्था को दे दिया गया था अब उसको कुछ इनाम देने की बात थी।देहरादून हवाई अड्डा पर पहुंच कर हम लोगों ने अपने सामान उतरवाये ड्राइवर को कुछ रूपये देकर विदा किया फिर एयर पोर्ट में प्रवेश कर गये।वहां सारे सामान का चेक इन करवाने के बाद बोर्डिंग का इंत जार करने लगे । घर पर ऋतिका वैभव को फोन करके बता दिया गया किअब हमलोग एयर पोर्ट पर हैं शाम तक वंगलोर पहुंच जायेंगे।पिछली यात्रा का आनंद और घर के अंदर के आराम की कल्पना दोनों के बीच जूझते हुए हमने अपनी हवाई यात्रा की ।हां एक बात तो मैं भूल ही गई इस यात्रा में भी अमृतांशु का किसी कोर्स की ऑनलाइन परीक्षा चल ही रही थी।चलते चलते ही पढता और परीक्षा भी देते जा रहा था ।
वंगलोर हवाई अड्डा पर उतरने के बाद तय हुआ किएयर पोर्ट वाली टैक्सी से ही हम लोग घर जायेंगे ।ऋचा अमृतांशु लोग अपने सामान के साथ दो गाडी में और मैं और पतिदेव एक गाडी में जायेंगे।सामान के वेल्ट से सब सामान लेकर हम लोग बाहर आये।बाहर टैक्सी लगी हुई थी हम सब अपनीअपनी गाडी में बैठ गये और अपने घर के रास्ते चले।उधर वैभव को जब पता चला कि हमलोग टैक्सी से आ रहे हैं तो खूब प्रसन्न हुआ उसको आना नहीं पडा फिर उसने टैक्सी वाले को पता भी भेज दिया ।एक डेढ घंटा चलने के बाद हमारा ब्रिगेड वाला फ्लैट आ गया।वैभव काफ्लैट अट्ठारहवीं मंजिल पर था।मैंने कहा नीचे वेसमेंट में आओ सामान ले चलो ।वैभव और मेड इन्दिरा दोनों आये टैक्सी वाले का पेमेंट देकर विदा किया ।हम सामान लेकर लिफ्ट से ऊपर गये ऋतिका ,वैभव,दित्या सबने हमारी चरण धूलि ली सकुशल लौट आने का सुकून सबके चेहरे पर था।
समाप्त।
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