“तांडव “
तांडव कर रहे शंकर,
कांपते कंकड कंकड ,
सृष्टि की संरचना में ,
भरते ऊर्जा निरंतर ।
अग्नि हाथ में उठाये ,
दानव को इंगित करते,
जटाओं में चंद्र, सर्प ,
गंगा की धार रखते।
अर्धनारीश्वर रूप में ,
पहन कर्ण फूल ,कुंडल
हार ,बाजूबंद ,करधनी ,
ले छाये पूरे भूमंडल।
शोभता उत्तरीय ,जनेऊ
एक संग ही उनमें,
एकी कृत हुए दोनों ,
इस श्रेष्ठ नृत्य में ।
दाहिने हाथ में डमरू,
वांया पांव उठा कर ,
नाचते जा रहे मदहोश ,
कर्पूर गौर शिव शंकर।
पैंजनी ,कंकण,अंगूठी ,
सटा हुआ अधो वस्त्र,
तेज चक्कर लगाते,
देख सृष्टि है त्रस्त ।
उमा संग नृत्य कर शिव,
व्याप्त हैं जड चेतन में ,
संसृष्टि की क्रियाएं
,
छिपी हुई है इसमें ।
समेटे पंचतत्व को ,
समाहार कर सबों का ,
अभय मुद्रा ले के ये ,
उद्धार कर रहे जग का।
आकाश शरीर है उनका ,
हाथ हैं सभी दिशाएं ,
भानु,शशि,अग्नि नेत्र,
श्वास हैं ये हवाएं ।
जगत के अंदर हैं आप,
इसके बाहर भी आप ,
इसकी निरन्तरता भी,
बनाये रखते हैं आप।
ये दिव्य तांडव नृत्य,
करते जा कहे नटराज
करें कल्याण हम सबका,
मेरी विनती है आज।
विद्या
————-//////————-/////////———//
Leave a comment