कहां आ गई अनजानों में

दूर देश के वीरानों में

उम्मीदों का राजा कहां है

कपट जाल में फंसा जहां है

छूटा मां का कोमल आंचल

छत्रछाया पिता का प्रतिपल

लडते कूटते भाई बहन

संग संग अनगिनत प्यारे स्वजन।

वहां सरिता सी कलकल बहती

उमंग से भरी उछलती चलती

बांध दिया इन दीवारों ने

नियम परिनियम के पतवारों ने

लक्ष्मी बन गई इनके सदन की

वंदी बनी अनेक बंधन की

ऐसे बैठो वहां न जाओ

सबकी जी हजूरी बजाओ

समझ न आता करूं मैं कैसे

सबको खुश रख पांऊ ऐसे

मुंह किसी का न बन जाए

रार आवास में ठन जाये

डरी डरी सहमी सहमी मैं

ताकती मुंह परिजनों की यूं

मूड किसी का बिगड न जाये

पल में परलय हो जाये

जीवन जीना कहां सरल है

खुशी पाता कोई विरल है

यश और अपयश में यहां तो

मटर भर का अंतर है।

जीना यहां यूं ही होगा

उनकी ही शर्तों के अनुकूल

जरा भी बात नहीं मानी तो

होंगे सारे ही प्रतिकूल

घुट घुट डरते डरते जीना

हम बेटियों की है तकदीर

है कहीं कोई उस जग में

कर ले हमारी भी तहरीर ।

विद्या

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