तारा था मैं टूट गया

अम्बर से अवनि पर पडा

नभ के काले चादर पर

अगनित बार लगा बिखरा ।

आकाश गंगा दुलारती

थी सौंदर्य निखारती

सुषमा गर्वित था चकचक

लोग देखते थे टकटक ।

सोचता संसार अपना

मेरे लिये ही बना है

ये पूरा अनमोल धन

चाहता जिसे बहुत मन ।

देख कर धीमा प्रकाश

अहंकार से भर जाता

मैं मैं और कोई नहीं

ये चिंतन हर पल आता ।

सुन्दरता की शान से

गुब्बारा फूलता जाता

पता नहीं था उस समय

पतन निश्चित है होता ।

गिर गया तो फिर कहां मैं

किस अस्सीम में हूं खोया

विधि के जटिल विधान में

कर घमंड क्या ही पाया ।

विद्या

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