देखा है मैंने उनको

आंखों आंखों में हंसते

मछली पालने की खुशी

आपस में वितरित करते ।

साथ साथ आते दोनों

व्यतीत करते सुखद पल

खाना पीना सोना सब

पूरा हो जाता तट पर।

पकड पकड मछली दोनों

पुलकित होते रहते थे

आज इतना माल पाया

एक दूजे से कहते थे ।

संतुष्ट आनंदित सभी

स्नेह से भरा था जीवन

देख देख जीती रहती

सुन्दर स्फुरित स्पंदित क्षण ।

दे दे मैं खुश होती थी

उनके जीवन की आशा

रिक्त हस्त होने पर अब

छाई है घोर निराशा ।

गदराये अपने यौवन

पर इतराना इठलाना

भूली बातें हो गईं

उन्हें देख कर मुस्काना ।

ऐसा लूटा लोगों ने

सारे प्राणी खत्म हुए

कंकड पत्थर भी सूखे

तट घाट भी ध्वस्त हुए ।

मछुआरे जोडी ने भी

आना जाना है छोडा

निराशा भरे भाव लिये

अपनों का मुख है मोडा।

ठूंठ सी बन गई हूं मैं

नहीं रही सरस जलधार

करती आशा भींगे दृग

काश पुनःआये रसधार ।

विद्या

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वव्य

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