पंचम में पिक फूटते, अमराई में रोज ।
कभी मंद, फिर तीव्र में, रहे हृदयधन खोज ।।
मनमोहक ऋतु आ गयी, मनभावन मधुमास ।
कली-कली है चाहती, भौरें आवे पास ।।
मधु ऋतु की दीवानगी, मधु में खोया ठौर।
आम्रडालियां झूमती, ले, ले, नूतन बौर।।
नव कोंपल उग देखते, धरती का श्रृंगार।
प्यारा मोहक दीखता, ये सारा संसार ।।
जूही बेला मोगरा, महमह करता बाग।
आया वसंत प्यार से, मन में गूंजे फाग ।।
पसर रही सखि चांदनी, गिरि वन उपवन गांव।
नदी-नदी पर डालती, धीमे-धीमे पांव ।।
चंदा आया दूर से, मिली-अकेली-रात ।
शब्दहीन अनुगूंज में, खुली सुहानी बात।।
पूर्णचंद्र ले अंक में, सागर दौड़ा जाये।
लहर झकोरे जोर से, बहता पिघला आये।।
दिव्य पुलक में खोलती, भू के प्राण मरोर।
छलक चांद से चांदनी, फैली चारों ओर ।।
छलके जल कण गागरी, उछल उछल गिर जाय।
बूंद-बूंद विधु झांकता, अगनित छवि दिखलाय ।।
विद्या
———-/////———/////———/////————-/////————
टिप्पणी करे