जीवन के झंझावातों से

आते जाते आघातों से

डरना नहीं न घबराना है

दीप उम्मीद का जलाना है ।

चाहे प्रलय क्यों न आ जाये

आकाश टूट कर गिर जाय्

उथल पुथल हो सारा संसार

उम्मीद का दीप जला रह जाये ।

इस दीप में है भीषण शक्ति

पा सकती है अनंत में भक्ति

घने निराशा भरे समय में

रक्षा कर सकती लगाती युक्ति ।

कुच कुच अंधियारा छा जाये

ज्वालामुखी भले फट जाये

कुदरत की विनाशलीला से

धरा ये तहस नहस हो जाये ।

नदी में डूब निकल जाना है

पंकिल मार्ग से न घबराना है

कांटे चुभते रहे पांवों में

दीप उम्मीद का जला रखना है ।

आशा पर आकाश टिका है

संकट आना कहां रूका है

जीवन के उतार चढाव में

मन इस दीप पर ही टिका है ।

विद्या

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