ये जीवन ठहराव नहीं है
चलती फिरती इक धारा है
प्राण वायु के चलते रहने
तक मिलता नहीं किनारा है ।
धारा ऊपर उठती गिरती
सुख दुख की ही बारी चलती
कब कैसे क्या हो जायेगा
किसी को भी बता न सकती ।
क्षण में क्षणाक हो जाता है
क्या अंदाज कोई लगा सके
जरा मरण सह प्रेम जवानी
सभी हाथ में ही है उसके ।
झिलमिल झिलमिल करती माया
भ्रमित करती ललचाती रहती
मोहित होकर मानव फंसता
कुटिलता से कार्य कर जाती ।
ईर्ष्या,द्वेष ,घृणा ,घमंड सब
अपना प्रभाव डालते रहते
विचलित कर आत्मा चेतना को
जीवन में विष भरते रहते ।
सद्भाव शीघ्र न आ पाता है
लोभ ग्रसित जनता के मन में
दुर्भाव भरा ही चलता जाता
मानव अपने जीवन रण में ।
कटे काठ के टूकडों जैसे
जीवन जल में बहता जाता
फिर वो अपनी किस्मत के बल
अनजान किनारे लग जाता ।
आरोह अवरोह उठा पटक
ये जीवन का विशेष गुण है
जीते जीते मरते जाना
ये ही इसका सहज नियम है ।
विद्या
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