Write a letter to your 100-year-old self.
प्रिय बुढापा,
मेरी जीवन संध्या ढल रही है पर सूर्यास्त बाकी है ।बचपन ,युवावस्था ,अधेडवस्था अब स्मृति बनती जा रही है।
बुढापा क्षीण होती देह,कांपते हाथ और अकेले पडते आंगन का नाम है ।जिससे डर लगता था पर अब मुझे पता चला कि तुम्हीं जीवन का गंभीर एवं सत्य अध्याय हो ।यौवन का नशा ,महत्वकांक्षाओं की उडान
सब बीते दिनों की बात हो गई ।उसकी जगह धैर्य,क्षमा,और एक शांत दृष्टि मिल गई है निवेदन है कि तुम आओ तो मेरी स्मृतियों को बचाये रखना जिससे मैं बैठ कर मानसिक जुगाली कर सकूं ।
मेरे बुढापा तुम मेरे जीवन में अवसान नहीं उगते प्रभात बन कर आना क्योंकि वो समय इस जीर्ण शीर्ण शरीर को त्याग कर नव जीवन प्राप्त करने का होगा नूतन प्रभात नया उल्लास ।
72वर्षीय महिला मैं
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