Vidu : Who am I?

(1)आपका नाम—-डॉ विद्या रानी
(2)पुकार नाम —-विदु
(3)जन्मतिथि /जन्म स्थान—-15.1.54/पुरानी सराय नाथनगर भागलपुर
(4)माता पिता का नाम —-श्रीमती प्रेमा प्रसाद ,स्व.गोपाल प्रसाद
(5)पति का नाम—-श्री अशोक कुमार सिन्हा
(6) शादी कब हुई—22फरवरी 1976
(7)आपकी संतान——दो पुत्रियां श्रुति कम्प्युटर इंजिनियर ऋचा हाउस वाइफ
दो पुत्र अभिनव प्लानिंग इंजिनियर (दुबई में) वैभव सॉफ्टवेयर इंजिनियर एप्पल कम्पनी (अमेरिका में)
(8)आपकी प्रारंभिक शिक्षा किस उम्र में और कहां हुई?——4वर्ष की उम्र में हिन्दू अनाथालय गुरूकुल विद्यालय नाथनगर में 1से 6ठी कक्षा तक दयानंद कन्या पाठशाला मीठा पुर में आठवीं से मैट्रिक तक मगध महिला महाविद्यालय पटना विश्वविद्यालय में प्री यूनिवरसिटी से बी ए हिन्दी आनर्स तकपीजी पटना विश्वविद्यालय में ए म ए बी एड पीएच डी तक
(9)आपकी शिक्षा उसका पूरा विवरण रिजल्ट ,स्कूल कॉलेज का नाम —-मैट्रिक 1967 दयानंद कन्या पाठशाला तृतीय श्रेणी प्री युनिवरसिटी 1968मगध महिला कॉलेज द्वितीयश्रेणी बीए पार्टवन —पास बीए हिन्दी आनर्स प्रथम श्रेणी एम ए स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग पटना विश्वविद्यालय 1971—73 रिजल्ट 75प्रथम श्रेणी बीएड बांकी पुर गर्लस स्कूल पटना विश्व विद्यालय द्नितीय श्रेणी
(10)आपकी पहली रचना आपने कब लिखी आपकी पहली रचना कहां और कब प्रकाशित हुई——पहली रचना तो याद नहीं है पर छात्र जीवन से ही कुछ कुछ कवितायेंएवं शोध निबंध,ललित निबंध हिन्द जनपथ जनसत्ता

कान्तिमन्यु, अनुशाीलन जैसी पत्र पत्रिकाओंमे छपती रही हैं भागलपुर में पहली रचना अधिकार का सुख बांका से छपने वाली पत्रिकाआज की कवितायें में छपी थी इसतरह पहली रचना कहकर कुछ बता नहीं सकती हूं पहले
छंदमुक्त कविताएं ही लिखा करती थी कुछ तुक जुड गये तो जुड गये कहानी लेखन का कर्म तो तब से प्रारंभ हुआ
जब मेरी एक सहयोगी ने आकाशवाणी में मेरा नाम कहानी लेखिका में लिखवा दिया और कथा लेखन को मैनें एक चुनौती के रूप में लिया उस दौरान पन्द्रह दिन में कुल तेरह कहानियां मैंने लिखीं उसके बाद आकाश वाणी से कहानियों के प्रसारण का दौर सा चल पडा साल मे तीन चार कहानियां प्रसारित हो ही जाती थीं विझान एवं तकनीकी शिक्षा आयोग की पत्रिका विश्व भारती पत्रिका बिहार भाषा परिषद पत्रिका जैसी अनेक पक्रिकाओं में मेरे शोध परक लेख छपे हैं
(11)साहित्य लेखन में आपके प्रेरणा स्रोत ——मेरे पिता जी थे उन्होंने उस जमाने में भी मुझे लडकों की तरह पाला और हर कार्य के लिये प्रोत्साहित किया
(12)आपकी पुस्तकों का प्रकाशन वर्ष और विधापृष्ठ संख्या के साथ —-जबाब दिया जा चुका है
(13)आपके साहित्य साधना में आपके परिवार की भागीदारी या सपोर्ट —-कुछ खास नहीं बच्चे तो बच्चे ही थे और पतिदेव एल आई सी के थे तो कोई कितना सपोर्ट करता हां विघ्न भी नहीं डालते थे उस पर विज्ञान के छात्र
(14)आपकी मुख्य विधा —-कविता और व्यंग लेखजिसकी पुस्तक प्रकाशित नहीं हो पाई है यत्र तत्र पत्रिकाओं में छपी हैं
(15)आप क्यों लिखती हैं किसके लिये लिखती हैं——मन में उमडते परिदृश्य को कागज पर उतारने के लिये लिखती हूं और सुधी पाठक जन के लिये लिखती हूंशायद उनके मन में रसबोध करवा सकूं
(16)साहित्यिक धर्म क्या है?——ईमान दारी से आस पास के परिवेश को किसी भी विधा में बांधना जो पाठक गण की दृष्टि खोल सकें उन्हे आनंद प्रदान करे और सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे समाज में सदबुद्धि लाये
(17)उपन्यास कहानियों में आपको प्लाट कहां से मिलता है?——जहां तक उपन्यास की बात है तो मेरे सारे उपन्यास या तो लोक गाथा पर आधृत हैं या पौराणिक गाथा पर मतलब कि कथा की बारीक रेखा पहले से मिल गई मैंने उसपर अपनी कल्पना से कथा संसार का निर्माण किया है अभी तक अपनी कल्पना से कोई पूरा उपन्यास नहीं लिखा है हां कहानियों के प्रायः सारे प्लाट बचपन से आजतक मिले विभिन्न पात्रों घटनाओं से मिले हैं जैसे स्वर्ग कहानी की डोमनी माय मेरी नानी के गांव में एक महिला थी जो हम लोगों के यहां काम करने आती थी उसी की कहानी है नीले निशान भी इसी तरह मेरे घर के सामने बागीचे में रहने वाले एक परिवार की कथा है जिसे मैं ने अपनी कल्पना से रूप दिया है नीले निशान कहानी का अनुवाद भी पंजाबी भाषा में हुआ है जसवंत सिंह विरदी ने किया हैइसी तरह से सारी कहानियां प्रायः इकहरी हैंऔर आकाशवाणी के प्रसारण के समय को दृष्टि में रख करलिखी गई हैं

(18)हिन्दी लेखन अंगिका लेखन में आपकी प्राथमिकता ?और क्यों?——मेरी प्राथमिकता हिन्दी लेखन है क्योंकि मैंने हिन्दी भाषा का विशेष अध्ययन किया है विभिन्न विद्वानों से रस अलंकार भाव विभिन्न विधाओं की शिक्षा पाई है साहित्य लिखने की जो बुद्धि आई है उसका मूल आधार हिन्दीपठन पाठन ही है अंगिका में जो कुछ लिख पाई हूं उसका आधार भी हिन्दी का ज्ञान ही है क्योंकि मैंने अंगिका की पढाई नहीं की है परिवार में बचपनसे बोलते बोलते जो सीखा है वही काम कर रहा है संयोग से मेरे ससुराल और मायके दोनों जगह की भाषा अंगिका ही है

(19)आज प्रिंटेड बुक और पत्रिकाएं संकट से गुजर रही हैं क्योंकि इसके पाठक कम हो रहे हैंआपइसे किस रूप में देखती है?——सिंहन के नहीं लेंहडे हंसन की नहीं पांत ।लालन की नहीं बोरियां ,साधु न चले जमात साहित्य रस के उपभोक्ता संसार में सदैव कम रहे हैं पत्रिकाएं संकट से गुजर रही हैं कि उनको खरीदने वाला नहीं है आज ईबुक का जमाना है किंडल में जितनी पुस्तके आ गई हैं उनका रूप बदल गया है१९वीं शताब्दी में जब प्रेस आया था तब एक क्रान्तिहुई थी आज नेट आया है एक नई क्रान्ति लेकर रस युक्त आनंद दायी रचनाओं के पाठक कभी कम नहीं हुए हैं न होंगे आज भी अमीर खुसरो मीरा तुलसी कबीर प्रसाद निराला दिनकर शिवपूजन सहाय जैसे रचना कारों की रचनाएं खूब पढी जाती है
(20)आज का साहित्य समाज/राष्ट्र के उत्थान में कितना योगदान दे रहा है?——साहित्य समाज के आगे चलता है साहित्य कार आगे की घटनाओं को पहले ही सूंघ लेता है समाज में जो परिवर्तन होने वाला है उसकी आशंका उसे पहले ही हो जाती है जैसे परिवार विवाह जैसी संस्थाओं ,नारियों की स्थिति पर साहित्य की दृष्टि देखिये प्रेमचंद की निर्मला अपने सौतेले बेटे को चाहती है पर प्रेम चंद उसका विवाह नहीं करवापाते है क्योंकि तत्कालीन समाज उसको स्वीकार नहीं कर पाता जबकि शिव पूजन सहाय के कहानी केप्लाट की भगजोगनी अपने सौतेले बेटे से विवाह कर लेती है क्योंकि साहित्यकार नेइतने दिनों बाद अन मेल विवाह से उबरने का ये मार्ग दिखाया है उसी प्रकार आज जो अंतर्जातीय विवाह प्रेम विवाह वगैरह बढ रहे हैं उसके लिये साहित्य भी जिम्मेदार है जो इस तरह की कहानिया परोस परोस कर समाज को मार्ग दर्शन दे रहा है आज अस्मिता विमर्श ,बाल विमर्श ,बृद्ध विमर्श ,अदिवासी विमर्श नारी विमर्श, दलित विमर्श जैसे जितने भी चल रहे हैं वे राष्ट्र केस्वरूप को बदलने में कितना योगदान दे रहे हैं उसका उदाहरण देखिये आज हमारी माननीया राष्ट्रपति आदिवासी समाज से आती है
साहित्स समाज राष्ट्र के उत्थान में सदैव आगे है और रहेगा
(21)रचना कार को अपने पाठकों से क्या अपेक्षा होती है?—-कमकम से पाठक गण पढें और उसपर अपनी सम्मति दें उसकी आलोचना करें प्रशंसा निंदा कुछ भी करें अपनी रूचि दिखायें
(22)आप कब लिखती है?—- जब भाव मन में भर जाते हैं यूं रिक्त मन से कुछ नहीं लिख पाती हूं भाव भरने परकहीं भी लिख लेती हूं सभागार में ट्रेन पर कहींभी
(23)आपका स्वास्थ्य कैसा है?—-एकदम लचर बीमारी के नाम गिनाऊंगी तो परेशान हो जायेंगे 90से स्लिप डिस्क से परेशान हूं इतने दिनों से दर्द के साथ जी रही हूं 16 से छडी लेकर चल रही हूं क्या बताऊं जैसी हूं आपने देखा ही है
(24)आपने सामाजिक कार्य किया है?——-नहीं मैंने कोई ऐसा सामाजिक कार्य नहीं किया है जैसा एनजी ओ वाले करते हैं पर मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की उपाध्यक्ष रही हूं दो टर्म और मैंने आजतक घर आने वाले शोधार्थी एवंछात्रों को निशुल्क पढाया है अगर ये समाज सेवा है तो इतना ही किया है ।

अतिरिक्त जानकारी ———मैं दलित साहित्य अकादमी ,भारतीय हिन्दी परिषद ,हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थाई सदस्य रही हूं मैंने जयपुर,जबलपुर,जोधपुर,वंगलोर,आसाम,इलाहाबाद,लखनऊ ,गोरखपुर दिल्ली , कलकत्ता ,शान्ति निकेतन ,सब जगह अपना शोध प्रबंध पढा है औरप्रोफेसरों का वर्ग भी लिया है ।जोधपुर के सम्मेलन में मैने वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्र में हिन्दी शब्दों की स्थिति पर एक शोधपत्र पढा थाजो वहां की पत्रिका में प्रकाशित भी हुआ था । कादम्बिनी पत्रिका में मेरा एक पत्र पुरस्कृत हुआ था जिसमे 500/मिले थे अपने महा विद्यालय की पत्रिकाप्रतिभा की संपादक रही हूं और विभाग केतरफ से भी अमितआखर नाम की पुस्तक का संपादन किया कुछ काल तक नवनीत में भी मेरे कुछ दोहे छपे हैं कविता कहानी उपन्यास नाटक आलोयना व्यंग ,निबंध जैसी समस्त विधाओं को लिखा है भाषाविज्ञान मेरी रूचि का विषय है मैंने अपना शोध पत्र भी छपवाया है।