इस स्वार्थी समाज में
क्षण क्षण बदलते जा रहे हैं हम
छीजते जा रहे हैं हम
जलते जा रहे हैं हम
जिन पर विश्वास था असीम
उन्हीं से धोखा खा रहे हैं हम ।
हम हैं क्या ?
मिट्टी के खिलौने
फूल के खिलने और मुरझाने के बीच
जो समय और स्थिति होती है
वही स्थिति झेल रहे हैं हम ।
मेरा दिल कांच का बना क्यों न हुआ
जिसके टूटने पर बारीक शीशे के कण
उड जाते हैं
और अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
अब तो दिलके टूटे हुए
बहुत दिन बीते और
अस्तित्व खोखला सा ही सही
बना हुआ है
इस खोखले दिल को
फिर से बसाने की कोशिश में
दिन रात एक कर रहे हैं हम ।
जब सफर लम्बा हो
और सहयात्री ढोंगी निकल जाय
ऐसी स्थिति को संभालने की
कोशिश में लगे हुए हैं हम
विद्या
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