रिश्ते टूट जाते हैं
ज्यों धूप ढलती है
धीमें धीमें मानस
पटल से उतरती है।
ह्रदय चनक जाता
वाण जैसे वाणों से
खोई खोई होकर
सोचती हैरानी से ।
शैवाल भरे सर में
विघ्न हटाते चल रहे
पत्थर से उठते तरंगों से
रिश्ते दूर हो रहे।
संवाद हीनता काटती
कोमल भावों को
निराश मन सहलाता
चोटिल घावों को ।
आंखों का अपनापन
जाने कहां खोगया
सब कुछ तो वैसा है
मन कैसे बदल गया ।
सफर के इस मोड पर
कैसे रह पाऊंगी
घुटन भरे दिल से तो
जी ही नहीं पाऊंगी।
बात चीत बंद हो गया
परिजन दूर हो गये
दूर दूर रहने को
क्यों मजबूर होगये।
बात करने में हिचक
जैसी आ जाती है
दिल टूटता रहता
आंखें भर आती हैं।
सोनें जैसी रातें
चांदी जैसे दिन
खे गये कहां पर
कैसे बीत गये क्षण क्षण ।
ह्रदय फटता जाता
स्नेह धार पाने ते
वो सुनहरे दिन फिर से
लौटा कर लाने को।
जीना तो बहुत कठिन है
इन बुरे हालातों में
कहां से लायें धीरज
ऐसे झंझा वातों में ।
गीता ज्ञान है मालूम
फिर भी मन विचलित है
कुछ नहीं ले जाना है
सब छोड जाना है ।
क्या चाहिये जीवन में
ये भी तो पता नहीं
कामनाओं का क्षितिज
विस्तार पाता रहता है।
चंचल मन की प्रपंच भरी
चाल में उसझा हुआ
जीवन अंधाधुन ये राह
चलता जाता है ।
विद्या
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