ऊंचे धरातल पर बैठ हम खो देते हैं
स्वयं को ,अस्तित्व को ,व्यष्टि को
सारी सृष्टि को प्रकाशित करने के लिये
सूरज को भी जलना पडता है
तभी वो पाता है देवत्व
श्रद्धा सुमन ,पुष्प ,अर्घ्य
अगर उच्चता को प्राप्त करना हो
तो सन्नद्ध रहना होगा स्वयं को तपाने के लिये
बिना तपे सोना भी नहीं निखरता है
जीवन की कठिनाइयों की तपन
तपा तपा कर मनुष्य को महान
बनाती रहती है।
बत्ती के जिस भाग को लौ बनना होता है
उसे स्वयं जल कर प्रकाश फैलाना पडता है
हम शीर्षस्थ बनने की कामना तो करते हैं
किन्तु जलने से डरते हैं
इसी से सारी व्यवस्था अस्त व्यस्त हुई है
क्या कोई दीप बिना जले
प्रकाश दे सकता है ?
विद्या
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