धोखा

आशा और अभिलाषाओं का क्षितिज

आज इतना विस्तृत हो गया है

कि हम स्वयं क्षितिज होने का दंभ भर रहे हैं ।

लेकिन क्षितिज तो मिलन विन्दु नहीं है

धरती और आकाश का

वह को केवल आभास है

और हम भी तो आभासित ही करते हैं

स्वयं को ,जो वस्तुत नहीं हैं

हममें न तो क्षितिज की विशालता है

और न ही उसकी स्वच्छता

हममें तो केवल संकीर्णता और

स्वार्थ लोलुपता है

पर,हम अपनी तुलना क्षितिज से कर

जो विशालता का आभास कर रहे हैं

लोगों को नहीं स्वयं को धोखा दे रहे हैं ।

विद्या

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