स्थूल से सूक्ष्म गति होती
पंच तत्व निर्मित काया की
शरीर से मन ,मन से बुद्धि
फिर चेतना औ आत्मा की ।
चेतना तक महसूसते
आत्मा तक तो पहुंच नहीं
परमात्मा का अंश वो
निकल गया तो प्राण नहीं।
आत्मा न मरती कहती
हमारी पवित्र ग्रंथ गीता
चिंतन करने में न जाने
कित्ते संतों का दिन बीता ।
चिंतन मनन चलता पर
आत्म चिंतन तो है ऐसा
तम में काली बिल्ली को
घूर घूर खोजने जैसा।
वो करता निवास सारे
ही जीवों की आत्मा में
उन्हीं से अलग भी रहता
व्याप्त निसर्ग की सत्ता में ।
ज्यों गगन होता प्रतिबिम्बित
लघु जल स्रोतों से समुद्र तक
सबसे ऊपर भी होता
भूमि को आच्छादित कर ।
त्यों परमात्मा है ही लिप्त
पिपिलिका से हाथी तक
उनसे परे सम्पूर्णता से
पसरा है पूरे ब्रह्मांड तक।
विद्या
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