हरियाली लिये यूं झूम रहा है
रसा का नाम सिद्ध हो रहा है
लेना नहीं कुछ इसे इस जगत से
सिर्फ दान ही सदा कर्म रहा है।
ले रस भू से और सौर से ऊर्जा
स्वयंमेव ही ये फल फूल रहा है
सरस प्राण वाला छांह देकर
मनु पुत्रों को आराम दे रहा है।
कोई भेद भाव नहीं मन में
देता दान अपने मौसम में
घाम झेल देते छांव वैसे
बाल वृद्ध युवा सब आ जायें
होजाते प्रसन्न अपने मन में।
ऐसा त्यागी ये साधु हों जैसे
सीख लें सभी उनकी सदाशयता
कटुता घटे आ जाये मानवता।
धरोहर धरा का है उपयोगी
रक्षा करेंगे सभी प्राण दे कर भी
रखेंगे पेडों को तन मन धन से
सुरक्षित करेंगे पर्यावरण को भी ।
विद्या
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