धवल चांदनी पसरी
जग का कोना कोना
पूरे निसर्ग का रूप
हो गया है चौगुना ।
रहस्य भरे धुंधुलके
में कोमल मन देखता
स्नेह के बीते क्षण को
विकल हो याद करता ।
वसंती पवन सिहराता
प्रेमी जन के रोम रोम
कामनाएं सतत जगतीं
मनुहार हो जाती मोम ।
विरही जन डूबे रहते
निराशा की नदी में
कैसे जगाये चांदनी
आशा उनके मन में ।
बिखरा प्रकाश विस्तृत
निर्बाध सा सब ओर
अंधकार भरे चित्त की
कुहेलिका का नहीं छोर ।
डूबा मन अंधेरे में
तो क्या करेगी चांदनी
अंतस्तल की अमा को
हटा पायेगी चांदनी ?
चांदनी में है उजाला
बंद आंखों में नहीं
अनुपम रूप चांद का
अंधों को दिखता नहीं ।
कुछ न करेगी चांदनी
सारा लावण्य लेकर
नैराश्य भरे ह्रदय को
चन्द्र प्रभा में डुबो कर ।
चांदनी तो है निर्मल
निष्पृह ,प्रशान्त ,उज्ज्वल
थके मनु के सर पर
मां का कोमल आंचल ।
अंधेरा शाश्वत नहीं है
चाहे जितना भी घना हो
अंधकार से प्रकाश की
ओर गति है जीवन की ।
अपनी रजत रश्मियों से
आस जगाती चांदनी
अंतस की अमा को
दूर करती चांदनी ।
विद्या
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