जीवन की ढलान पर
स्मृतियों के भांडार
उभ चुभ करते ऐसे
सरोज सर में जैसे ।
बुढापा जमा लेता
यादों का बडा संसार
कोई नहीं सुनने वाला
मन में गुनते अपार।
स्मृतियों की घनी झुंड में
बालमन झांकता है
गिल्ली डंडा औ कब्बडी
खेलना चाहता है ।
खेलने की कौन कहे
जानना भी न चाहे
कैसे पकड पकड कर
अपनी कथा सुनाएं।
अनुभव के भांडार में
लाखों हीरे हैं जडें
निरन्तर समय की धूल
सेधूमिल होकर पडे।
अफसर प्रोफेसर प्युन
अ कि बाबू कर्मचारी
अवकाशग्रहण पश्चात
सम होना लाचारी।
अपनी अपनी स्मृतियां
अपने अनुभव विकल
भरे पडे उनके मन में
खट्टे मीठे सुखद पल।
यादों का दंश टीसता
हाशिये पर हो रहा
सभी ज्ञान धरा रहा
जीवन आगे बढ चला ।
मन में भूचाल लिये
पंचतत्व में मिल जाना
यादों के इस झुंड संग
सृष्टि में फैल जाना ।
है हमारी नियति यही
उथल पुथल मन में लिये
जाना तो है उस पार
यादों का बोझ लिये ।
विद्या
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