हम व्यतीत हो गये

तृष्णा पिपासित ही रही

हम व्यतीत हो गये

सपना अधूरा ही रहा

रंग हम भरते रहे ।

इच्छानल दहता रहा

हम बुझाते रह गये

आकांक्षा बढती रहीं

हम पूरा करते रहे ।

जीवन है नश्वर यहां

इच्छाएं अविनाशी है

मिलते बिछुडते हम यहां

निर्दिष्ट क्षणों के वासी हैं ।

हमारी कामना का फलक

और फैलता ही गया

नित्य अपने कर्म से

रंग हम भरते रहे ।

निखरे रंग बिखरे रंग

अनचाहे मनचाहे रंग

चित्र अधूरा ही रहा

हम व्यतीत हो गये ।

विद्या

———-/////————-//////————-//////————-//////——-