तृष्णा पिपासित ही रही
हम व्यतीत हो गये
सपना अधूरा ही रहा
रंग हम भरते रहे ।
इच्छानल दहता रहा
हम बुझाते रह गये
आकांक्षा बढती रहीं
हम पूरा करते रहे ।
जीवन है नश्वर यहां
इच्छाएं अविनाशी है
मिलते बिछुडते हम यहां
निर्दिष्ट क्षणों के वासी हैं ।
हमारी कामना का फलक
और फैलता ही गया
नित्य अपने कर्म से
रंग हम भरते रहे ।
निखरे रंग बिखरे रंग
अनचाहे मनचाहे रंग
चित्र अधूरा ही रहा
हम व्यतीत हो गये ।
विद्या
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