अदृश्य प्राण वायु बीच
उठता धुआं आकार ले
अपनी कल्पना के रंग
से अनेक चित्र बनाते ।
सभ्यता के प्रतीक ये
उठ चुल्हे कारखाने से
नैसर्गिक जीवन में फैल
विषाक्त करता तपन से।
सिखाता दुनियावी बातें
क्षणभंगुर इस जगत में
क्या उडना औ क्या मिटना
इच्छा हो ज्यों मन चिन्तन में ।
अगन की गर्मी पाकर
धुआं ऊपर उठ जाता
तपन कम होते ही वो
वातावरण में जा मिलता।
ज्यों सम्पत्ति बढने पर मन
अहंकारी बनता जाता
कमी होने पर फिर वो
भूलुंठित होकर गिरता ।
हवा संग उडती उडाती
व्यापक कर देती चहुंदिश
बिखेर कर करके विलीन
कर लेती अपने वजूद में ।
जीवन धुआं सा यहां है
धुआं धुआं चहुंओर
उडकर मिटकर बताता
नश्वरता का अमर शोर ।
विद्या
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