“ मैं तो मात्र छोटा बच्चा था
जय भारत के महान वंश का
छोटा मोटा नन्हा हिस्सा था
मैंने तो युद्ध नहीं रचा था ।
पर वीर भीम का पोता मैं
रण कौशल मां से सीखा था,
हारे दल का ही पक्षलेना
उसने ये मूल मंत्र दिया था।
साधा था अगनित शस्त्रों को
शंकर दुर्गा सबको खुश करके ,
वर में तीन बाण पाया था ,
जो कि दिव्य पूर्ण अति तीक्ष्ण थे ।
वीर माता पिता का पुत्र मैं
रण का आकर्षण तो प्रबल था ,
महा भारत की सूचना पा
भाग लेने हेतु व्याकुल था ।
पहुंचा प्रपितामह से मिलने ,
रोकने गया उनको रण से ,
डर था कहीं मारे न जायें
पितामह मेरे दिव्य शरों से ।
कीर्ति भीष्म की मलिन नहीं हो
यश मटिया मेट न हो जाये
उनको रोकने गया रण से
प्यारा पर पोता घर आके।
पर उन्हें तो धर्म की पडी थी
राज धर्म छोड देते कैसे ,
छोटे के भोले आग्रह को ,
सरलता से मानते कैसे ।
महा भारत का महा नायक ,
कान्हा गिरधर नटवर छलिया
पता उन्हें था सब होनी का,
किया वही जो समुचित था ।
पहचाना बाणों की दिव्यता ,
तुरत ही भविष्य दीखा उनको
अगर रण पूर्ण करना है तो
अवश्य रोकना होगा इसको ।
प्रण के कारण मिला न मौका
इस समर में वीर बनने का
परिणाम जिन्हें पूर्ण पता था
वो ऐसा क्यों होने देता ।
मांग लिया मेरा तो सिर ही
रण शुभारंभ के बलि रूप में ,
सैनिक बनने की मेरी इच्छा
सिमट गई मात्र देखने में ।
रण में मरें या मर कर देखें
एक ही बात थी मेरे लिये ,
कटे सिर से देखने का वर ा
देकर ही कृष्ण खुश हो लिये ।
कटे सिर से ही मैंने देखा
महा भारत अटठारह दिनों तक
जो कुछ भी निश्चित थानिर्दिष्ट था
फैला हुआ धर्म से अधर्म तक ।
जिस रण के प्रारंभ में हिचके
पितामह अर्जुन समर क्षेत्र में

गीता का पाठ सुना कर तब
कर्म योग सिखाया था प्रभु ने ।
उसी समर से वंचित हुआ मैं
वीरता मेरी धरी रह गई ,
सारे परिजनों के समक्ष ही
मेरी जिन्दगी बलि चढ गई ।
देखा मैंने मरते वीरों को
कटे सिर नंगी आंखों से
हर उम्र के बलवानों को भी
असहाय हो गिरते घातों से ।
जितने लोग मारे गये रण में
उनको मरा हुआ कहा गया
पार्थिव शरीर होता है नष्ट

आत्मा तो कभी मरती नहीं

दिखाकर विश्व रूप अर्जुन को
समझाया पूरे सृष्टि चक्र को
आना और जाना निश्चित है
क्यों डरते देख सम्मुख रण को ।

लाखों लोग मरे इस रण मे
मानों धरा भार दूर किया
अपनी अपनी नियति भोग कर
सबने परम धाम पधार लिया ।

विजय औ राज का आनंद सुख
भी तो न मिला स्वच्छ परिवेश में,
रक्त रंजित धरा अश्रु मुख लोग
ही तो बचे थे सबसे अंत में ।
जीता धर्म हारा अधर्म यहां
छल बेईमानी प्रबल रहा
कितने रूप धरे लोगों ने
वीरता का अनेक ढंग दिखा।
मैंने भाग्य लिखे को पाया
कटे सिर मे भी जिन्दा रहा
देखा पूरा महाभारत रण
वर में खांटूशाम रूप पाया ।
मेरी अमरता दुख की कथा
मनक्षोभ की साकार व्यथा है
तारण हार की ही कृपा है
दानवी पुत्र बना देवता है ।

विद्या

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