चौंसठ कलाओं से जग को लुभाते हो
जैसा युग बदलता है वैसा बन जाते हो ।
सैकडों जन में सिर्फ एक को बचाते हो
भस्म सब हो जाता गीता बचा लेते हो ।
सिद्ध कर दिया तूने तुम्हीं सर्वव्यापी हो
त्तेरे विराट रूप में ही जगत समाया है ।
मानव समझता नहीं आपस में झगडता है
तू ही सब करता है तूही सब पाता है।
ब्रह्मांड के अंदर तुम तूही इसके बाहर है
जल,थल,नभ सबमें तूही तू छाया है ।
तेरा नटखट बचपन स्नेहिल जवानी तेरी
सारथी बन तूने गीता सुनाया है।
उठाया था गोवर्धन जिस छोटी उंगली पर
उसी छोटी उंगली से सुदर्शन चलाया है ।
किया नर्तन तूने कालिय के फन पर
फिर से नाचो नाथ आज के नागों पर ।
करती विनती तेरी करबद्ध हाथों से
आ जाओ फिर से नाथ जग त्राण हरने को ।
मेरा कनु गोविन्दा मोहन वंशी वाला है
लीला पुरूषोत्तम है छलिया न्यारा है ।
विद्या
———////———//////———-/////———//////————//////
टिप्पणी करे