चिंतन मन में चलता है
मन ही चिंतन करता है
दोनों की गति अलग है
मन स्वच्छन्द विचरता है ।
चिंतन सूक्ष्म व्यापार है
ऊर्ध्व दिशा उसकी गति है
मन दसों दिश विचरता
अति चंचल उसकी मति है ।
चिंतन साक्षात्कार कराता
आत्मा के स्वरूप का
अंतर की दुनिया का रूप
ठीक ठीक समझने का ।
मन सब कुछ भूल भाल
भौतिकता में उलझता है
माया के चमकते रूप पर
बार बार मरता रहता है।
चिंतन में जब मन लगाता
मानव बैठ ध्यान लगा कर
मन वहां से भटकना चाहे
ध्यान छोड जगत मेंआकर ।
साधक सफल वही होते
मन की लगाम पकडे हों
चिंतन की ऊर्ध्व गति से
ऊपर उठते जाते हों।
विद्या
———////———////———/////———-/////———/////———