vidus

Eternal Learner

परम सत्ता

कायनात का निर्माता

इसे चलाता जा रहा

जग के समस्त जीवों को

पल पल यहां ला रहा ।

सारे अवतरित होते

पंच इन्द्रियों के गुण संग

अपनी विशेषताएं लिये

पंच तत्व वाले तन संग ।

यह देह तो है उपहार

उसी परम सत्ता का

बनाने चलाने मिटाने

का काम भी है उसी का।

जन्म से मृत्यु तक हमें ले

कर चलता आद्योपान्त

तन की आंतरिक क्रियाओं

को निभाता बिना भ्रान्त।

उसके हाथ की कठपुतली हम

मनमाना नचाता रहता

खाद्य को ऊर्जा में बदलता

निष्क्रिय वस्तु बाहर करता।

अपने अंदर की घटनाओं

पर हमारा कुछ वश नहीं

ब्रह्मांड में कहां हैं हम

इसका भी कुछ पता नहीं ।

विद्या

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