भावनाओं से है भरा
नारी मन का संसार
कुदरत के सारे रंगों
से अटा पडा अपार।
आसमान से ऊंचा
धरती से भी गहरा
थाह लेना कठिन है
हरदम रहता पहरा।
सचेत संतुलित आंखें
शान्त स्थिर आत्मा
सजाती मनो योग से
अपना प्यारा सपना।
हिम्मत कभी न हारती
ठान लेती अडिग प्रण
जो ठानती सो करती
बिना बिताये पल क्षण ।
प्रेम का सागर भरा
उसके ह्रदय का कोष
उपलब्ध हर वक्त हरेक
को दे पाता संतोष ।
परन्तु क्रोध जब आता
ज्वाला सी जल उठती
प्रचंड रूप धर कर वो
परिजन सुरक्षा करती ।
करूणा ,स्नेह ,ममता
दया ,त्याग ,बलिदान
कूट कूट कर भरे हैं
नारी मन है महान ।
पुष्प सी कोमल है वो
बज्र सी होती कठोर
जीवन के झंझावातों
से जूझती बिना शोर ।
सागर सा उछलता
कभी नदी सा शान्त
क्रोध में उबलता कभी
स्नेह की धार प्रशान्त ।
विद्या
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