मजबूरी

वर्तन मांजते मांजते

घिस गए हाथ

हो गई मटमैली चूडियां

सपने देखते -देखते

थक गई आंखें

खत्म न हुई मजबूरियां ।

अपनी मजबूरियों का दोष

किसे दूं ,

अपने को पति को समाज को

सुना न पाई जो सब को

उस दबी आवाज को ।

कौन लेता भार यह

कौन करेगा उद्धार

सुनती थी कुछ होते हैं

जीवन के सत्य विचार

खो गये वो कहां पर

किन लोगों ने लिया लूट

कम से कम इसके लिये तो

हमें दी जानी चाहिये छूट ।

विद्या

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