What are three objects you couldn’t live without?
मैं 1990 से ही स्लिप डिस्क एवं हाई ब्लडप्रैसर से पीडित हूं इस कारण मेरे जीवन में मेरी दवाईयां ,छडी और ह्वीलचेयर ये ऐसी चीजें ऐसी हैं जिनके बिना मैं नहीं रह सकती हूं ।
Eternal Learner
वार्ता की नई चाल में
जगत घूम रहा बेचैन
पूरी भीड में एकाकी
अपने आप में हैं लीन ।
सारे जग की न्यूज जान
पाठक खबरी लाल बने
नाते रिश्ते घर परिवार
छोड सभी बेहाल बने।
भूल रहे हैं हम सब यूं
परस्पर बतकही करना
छोटी छोटी बातों पर
कहकहे लगाना हंसना ।
ड्राइंग रूम गेस्ट के संग
बैठ बैठ कर टी पीना
अपने अपने मोबाइल
के चैट पर लगे रहना।
एकाकी पन छा गया है
सब लोगों के जीवन में
रखते हैं खबर लंदन की
नहीं पता अपने घर की ।
नीरस मन फालतु बातें
अनाप सनाप रील देख
डूबते सपनों की जद में
छोड छोड सामान्य रेख।
सोशल मीडिया खा रहा है
जन जन कासोशल जीवन
चैट में परम सुख पाते
अमीर गरीब सारे जन ।
विद्या
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पाठव
मैं एक टुकडा भले हूं पर बडा अहम हूं
लाज युवतियों का छिपाने का साधन हूं
सूती रेशमी सीफॉन जार्जेट मलमली हूं
फुलकारी जरदोजी मधुवनी कढाई से सजा हूं
पहले जहां बिना मेरे न निकलती थीं लडकियां
मेरे कोमल स्पर्श से लरजती थीं सखियां
हवा में उड जाता था उनका लालनीला दुपट्टा
जवां दिल की धडकनें बढा भी जाता था वो
आज मैं पडा हूं घर की आलमारी में घुस कर
सह्ज कर इस्तरी भी करके
मैं उडाता था नींद कितने मनचलों के
अब स्वयं उड गया हूं व्यवहार से मन से परिधान से
धीरे धीरे बाजार से भी उड जाऊंगा
इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाऊंगा ।
विद्या
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प्रचंड, प्रशांत, निरन्तर सतत
प्रवाह काल का चलता है।
जन्म मरण की यात्रा में,
क्षण क्षण सहयोग करता है।।
विरवा वृक्ष बन जाना,
शिशु से युवा वृद्ध बनना,
कलियों का फूल बनना,
फिर फूलों का मुरझाना,
धीमे धीमे, एक गति से,
मौन रह कर कार्य करना,
सब समान रूप देखना,
सम दृष्टि की सीख देना।
महाशक्ति संपन्नता देखो
पल क्षण को भी न सकता।
अनंत प्रवाह लिए सृष्टि को,
एक गति से लेकर चलना।
इस शक्तिशाली का नियंता
कौन है कैसे पहचाने,
अद्भुत गति विचित्र लीला को,
किस तरह समझ समझाले।
(विद्या )
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तारा था मैं टूट गया
अम्बर से अवनि पर पडा
नभ के काले चादर पर
अगनित बार लगा बिखरा ।
आकाश गंगा दुलारती
थी सौंदर्य निखारती
सुषमा गर्वित था चकचक
लोग देखते थे टकटक ।
सोचता संसार अपना
मेरे लिये ही बना है
ये पूरा अनमोल धन
चाहता जिसे बहुत मन ।
देख कर धीमा प्रकाश
अहंकार से भर जाता
मैं मैं और कोई नहीं
ये चिंतन हर पल आता ।
सुन्दरता की शान से
गुब्बारा फूलता जाता
पता नहीं था उस समय
पतन निश्चित है होता ।
गिर गया तो फिर कहां मैं
किस अस्सीम में हूं खोया
विधि के जटिल विधान में
कर घमंड क्या ही पाया ।
विद्या
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कहां आ गई अनजानों में
दूर देश के वीरानों में
उम्मीदों का राजा कहां है
कपट जाल में फंसा जहां है
छूटा मां का कोमल आंचल
छत्रछाया पिता का प्रतिपल
लडते कूटते भाई बहन
संग संग अनगिनत प्यारे स्वजन।
वहां सरिता सी कलकल बहती
उमंग से भरी उछलती चलती
बांध दिया इन दीवारों ने
नियम परिनियम के पतवारों ने
लक्ष्मी बन गई इनके सदन की
वंदी बनी अनेक बंधन की
ऐसे बैठो वहां न जाओ
सबकी जी हजूरी बजाओ
समझ न आता करूं मैं कैसे
सबको खुश रख पांऊ ऐसे
मुंह किसी का न बन जाए
रार आवास में ठन जाये
डरी डरी सहमी सहमी मैं
ताकती मुंह परिजनों की यूं
मूड किसी का बिगड न जाये
पल में परलय हो जाये
जीवन जीना कहां सरल है
खुशी पाता कोई विरल है
यश और अपयश में यहां तो
मटर भर का अंतर है।
जीना यहां यूं ही होगा
उनकी ही शर्तों के अनुकूल
जरा भी बात नहीं मानी तो
होंगे सारे ही प्रतिकूल
घुट घुट डरते डरते जीना
हम बेटियों की है तकदीर
है कहीं कोई उस जग में
कर ले हमारी भी तहरीर ।
विद्या
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उसकी उठती गिरती लहरें
चिन्तन सी चलती रहतीं
लगातार आती जाती
सततता की कथा कहतीं।
अनेक नदियों को पाकर
अपने में विलीन करना
खारा खारा बना देना
एक रंग में रंग देना ।
ज्यों आत्मा ब्रह्म से मिल
परम धाम पा लेती है
त्यों नदियां सागर से मिल
मॉजिल प्राप्त करती हैं ।
नीली आभा प्रतिबिम्बित
पारदर्शी चमकीला दर्पण
प्राकृतिक सौंदर्य लिये ये
महाकाय बन जाता अर्णव ।
बता रहा सागर सबको
जग में सरोज बनकर रहना
सुख दुख आरोह अवरोह
हर पल निष्काम बन सहना ।
विद्या
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