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विभागीय कार्यक्रम के दौरान एक अत्यंत दिव्य व्यक्तित्व वाले विद्वान को बुलाया गया था जिनसे मेरा पूर्व परिचय नहीं था ।
गोरा रंग ,लाल टीका ,झक सफेद धोती कुर्ता ,काला चप्पल पहने डॉ मन मोहन मिश्र जब विभाग में आये तो ऐसा लगा कि ज्ञान का सागर सामने खडा है।उनके डेढ घंटे का भाषण सुनने के बाद मैं इतना प्रभावित हुई कि मैंने फिर एक घंटे का समय मांगा और ढेरों साहित्यिक चर्चा की।उसके बाद से मैं अपनी किसी भी तरह की शंका का समाधान करने के लिये उनसे मार्ग निर्देश लेती थी और वे प्रसन्नता पूर्वक बता देते थे ।उनसे मिलने के बाद मेरे लेखन में बहुत सुधार आया ।
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