वोट

वोटों का जमाना था

प्रतिदिन हंगामा था

इन्क्लाब जिन्दा वाद

इसको,उसको वोट दो

दोनों दल भयंकर थे

उनके कुछ कुछ किंकर थे

प्रचार का बाजार गर्म था

दोनों को न शर्म था

पूरी हवा उष्णता से पूर्ण थी

आ गया मतदान का दिन।

जनता के दो दल कोई इससे

प्रभावित कोई उससे प्रभावित

कि इतने में खबर आई

फलां आदमी बैठ गये

समर्थकों ने आवाज लगाई

क्यों बैठे ,कैसे बैठे,किसने बिठाया

पता चला कि ये इसलिये बैठ गये

कि वो कुर्सी पर बैठ जायें ।

दल के ऊपरी हिस्से में समझौता हुआ

और दल के हित केलिये

अपने समाज के ,जनता राष्ट्र के ,

जातिवाद,समानतावाद,सम्प्रदाय वाद

समाजवाद के हित केलिये

जिन जिन चीजों के लिये वो खडे हुए थे

उन्हीं चीजों केलिये वो बैठ गये।

जनता को क्या लेना देना

जब वो खडे हों तो वोट दें

जब वो बैठ जायें तो उनके निर्देश पर

किसी को वोट दें

वैसे भी वोगस वोटों का जमाना है

बूथ कैपचरिंग का हंगामा है

प्रजातंत्र की लूट है

मृतकों को भी वोट देने की छूट है ।

विद्या

——////——////——////——-////——////——////——////