vidus

Eternal Learner

साक्षी

कोई साक्षी नहीं हमारी अस्मिता का

कोई नहीं अपनी पहचान

जल की लहरों सदृश हम

राह हमारी है अनजान

किसे साक्षी माने हम

हम तो ऐसे कठपुतली हैं

डोर हमारी अदृश्य केहाथों में है

जो है नचाता सदा ।

देखें जरा और निकट से

हम भी तो हैं कीडे जैसे

विश्व भर में सांस लेते

जीने को हैं विवश ऐसे

कौन बनेगा उसका साक्षी

कि हमारा भी अस्तित्व है

सब तो भूले हैं सुख में

अभिमान में अकडे हैं ।

साक्षी की जरूरत कहां

तुम स्वयं ही साक्षी हो

जहां रहो उपस्थित तुम

निखारो अपने व्यक्तित्व को ।

विद्या

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