When is the last time you took a risk? How did it work out?
लास्ट टाइम मेरे साथ जो घटित हुआ उसे रिस्क लेना नहीं कह सकते हैं ।रिस्क से डरना और बचना कहा जा सकता है ।आज से दो साल पहले मैं सारजापुर के नाम्बियार वेलेजिया के एक विला में अपनी छोटी बेटी ऋचा और अमृतांशु के साथ थी ।वो अपने दो बच्चों ,सासु माता ,दो स्टाफ और एक कुत्ते के साथ रहती थी उसमें मैं पतिदेव के साथ वहीं थी।उस कॉलोनी की एक संयुक्त वेवसाइट थी जिसपर सूचनाओं का आदान प्रदान होता रहता था।एक रात उस वेव साइट पर एक घूमते हुए तेंदुआ का चित्र आया इस सूचना के साथ कि जंगल से भागा हुआ तेंदुआ हमारी कॉलोनी के बगल वाले मैदान में देखा गया
है इसीलिये सारे लोग सतर्क हो जायें ।इस न्यूज ने हमलोगों को वेचैन कर दिया ।विला के आगे का दरवाजा तो लकडी का हैकिन्तु पीछे का दरवाजा शीशा का है उसपर भारी परदा लगा हुआ है।हमें इस बात का डर लग रहा था कि अगर तेंदुआ आ गया तो शीशा तोडने में उसे कितनी देर लगेगी।ऋचा ने अपने कुत्ते साल्टु और दोनों स्टाफ को भी विला के अंदर बुला लिया कि बाहर नहीं रहो सब लोग एक जगह रहेंगे।चारो तरफ की लाइट जला लिया गया ।उसके आने पर भगाने के लिये सूखी लकडियां ,घास जगह जगह पर इक्कट्ठा किया गया जिससे आग जलाने में सुविधा हो।प्रत्येक सडक पर सिक्युरिटी गार्ड
के पास भी मशाल जैसी चीज थमा दी गई थी जिससे तेंदुआ के आने के बाद आग जला कर उसे भगाया जा सके।इतनी तैयारी के बाद भी ह्रदय धडक रहा था ।सारे लोग बीच वाले हॉल में आ गये कि शीशे से कोई देख न ले।इतनी तैयारियों के बाद भी हमे लगता रहता था कि किसी क्षण वो आ जायेगा और हमें अपना भोजन बना लेगा।दिन तो ठीक ठाक कट जाता था रात बडी मुश्किल से कटती थी।तीन चार दिनों तक विभिन्न मुद्राओं मेंतेंदुआ की तस्वीर आती रही हम लोग दहशत में रहे ।पांचवें दिन खबर आई कि फारेस्ट विभाग के लोगों ने उसे पकड लिया उसके बाद हमलोगों की जान में जान आई ।
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