जीवन हम मनुष्यों का
भटकन और थकन
चुभन ,जलन ,तपन ,
आलोडन और विलोडन
फिर भी आनंद मय।
मन डरता है मृत्यु से
जो हमें वैकुंठ पहुंचा
सकती है ,उस शक्ति से
हमें इसी तपन की चाह है ।
हम संसार रूपी मृगतृष्णा के प्यासे
भ्रमण का आधार ढूंढते रहते हैं
इसके बिना आनंद कहां?
राजमहल में रहनेवाले भी
यायावर बनना पसन्द
करते हैं,क्योंकि भ्रमण में उल्लास है
विश्राम में शैथिल्य
एक आकांक्षा पूरी होने के बाद
हम दूसरे को बनाते हैं
संजोते हैं संवारते हैं
फिर उसके लिये
व्यथित ही रहते हैं ।
विद्या
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