खामोशी का शोर

मौन के अंदर ही मचता

चिन्तन का विपुल शोर

बाह्य जगत से कहीं ज्यादा

वेचैन करता चहुंओर ।

चाल इसकी चतुर्मुखी है

मन की गति से चलता है

दशों दिशाओं में घूमता

धरा गगन एक करता है।

विचार के सागर में उठ

तरंगों सा हिलोर मारता

गहरे चिन्तन का उद्वेलन

हर पल हमें झकझोरता ।

जैसे लकडी की दीमक

खोखला कर देती घर को

वैसे ये शोर जर्जर बना

देता है मानव मन को।

बाह्य कोलाहल से घबरा

एकान्त खोजा करते हैं

हृदय के उद्वेलन से घबरा

उदभ्रान्त हो विचरते हैं।

सुनते नहीं उस शोर को

अपने दोनों कानों सें

सुन पाते हैं हम उसे

अंदर के अरमानों से।

हाहाकार मचाता है

भावनाओं को मथ डालता

लाउडस्पीकर से ज्यादा

मौन का शोर दुखी करता ।

क्या करें निर्वाक हैं हम

चिन्तन मंथन की आंधी को

इस वेचैनी को कैसे

समेटे मन शान्त हो।

चहुंदिश से आती बातें

गम्भीर चिन्ता में डुबाती

अन्तर तम की आवाजें

सुख से जीने नहीं देती ।

विद्या

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