vidus

Eternal Learner

मोती

आते ही सूरज ने रश्मियों के हाथ से

धरती के व़क्ष स्थल को खोजना शुरू किया

खोजने लगा वह रात्रि द्वारा छुपाये

मोतियों के गुच्छेों को और समेटता चला गया अपने हाथों से

जोडोंकी गुन गुनी धूप मानो

ठिठुरते हाथों से नहीं संभाल पाती

ओस के मोतियों को इसीलिए

बडी देर तक ओस से पटी धरती

भिंगोती है चलने वालों के पांव

पैंट,साडियां,चप्पल

और अहसास दिलाती है कि

जाडे का बूढा सूरज ओस के मोतियों को

सफलता से उठाने में असक्त है

ग्रीष्म में जो काम मिनट में हो जाता छा

उसमें अब लगते हैं घंटों

धरती ठिठुरती -ठिठुरती इसी

चादर को ओढने को विवश है ।

विद्या

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