आते ही सूरज ने रश्मियों के हाथ से
धरती के व़क्ष स्थल को खोजना शुरू किया
खोजने लगा वह रात्रि द्वारा छुपाये
मोतियों के गुच्छेों को और समेटता चला गया अपने हाथों से
जोडोंकी गुन गुनी धूप मानो
ठिठुरते हाथों से नहीं संभाल पाती
ओस के मोतियों को इसीलिए
बडी देर तक ओस से पटी धरती
भिंगोती है चलने वालों के पांव
पैंट,साडियां,चप्पल
और अहसास दिलाती है कि
जाडे का बूढा सूरज ओस के मोतियों को
सफलता से उठाने में असक्त है
ग्रीष्म में जो काम मिनट में हो जाता छा
उसमें अब लगते हैं घंटों
धरती ठिठुरती -ठिठुरती इसी
चादर को ओढने को विवश है ।
विद्या
——////——-////——////——/////———/////———//////