कल्प वृक्ष की कल्पना आनंद
से भरती रहती जीवन
सोचो जो सो ही पाओ
मिलजाता मन माना धन।
काल्पनिक संसार के अंदर
बन जाता जगमग चित्र
उठती प्रसन्न मन के भीतर
कमनीय कामना यत्र तत्र्।
क्या क्या न हम चाहते
कल्पवृक्ष पाने के बाद
सोना ,चांदी,हीरे सब
गृह में सजाने के बाद।
है अजीब कल्पना ये तो
सागर मंथन से मिला है
देव दानव ऋषि मुनि सबको
अवसर पर साथ दिया है।
कल्प वृक्ष ,कामधेनु मिलकर
दिव्य लोक साकार करते
ब्रह्मांड के असीम रहस्य
की सत्य जानकारी देते ।
दिव्य इच्छा पूर्ति वृक्ष है ये
समृद्धि प्रचुरता से देता
मनोकामनाएं पूर्ण कर
मन को गद गद कर देता।
कल्पतरू,कल्पद्रुम ,सुरतरू ,
देवतरू ,पारिजात जैसे
पवित्र नाम धारण करके
इच्छापूर्ण करता कैसे?
निर्मल ,निष्काम ,शुद्ध मन से
जो कुछ भी मांगा जाये
मिल जाता है तत्क्षण वो
बिना एक पल भी गंवाये ।
लोलुपता से भरे लोग
लोभ भरी कामना करें
सूख जाता है ये समूल
कुछ भी नहीं दे पाये।
आस्था में ही पनपता
दिव्य तरू का परम रूप
इच्छानुसार वो फल देता
रंक को भी बनाता भूप ।
विद्या
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