नभ में जातीं मिशायलें
धुआं धुआं सारा संसार
विनाश का नृत्य है प्रारंभ
मानवता रोती रही वेजार।
दंभ अहंकार से भरा युग
शक्ति पर ऐसा नाज करे
क्षण क्षण बदलती सीमाएं
कहां किससे फरियाद करें ।
इतनी नफरत फैली है
फिर आंसुओं की वाढ है
मानवता शान्त है रोती
करूणा दया बेकार है ।
स्वार्थ की है परा काष्ठा
लोलुपता की तो इति नहीं
धर्म ,अहिंसा,सत्य,त्याग ,दया
के भावों की मति ही नहीं ।
कितने घर उजड गये
लाखों गोद हुई सूनी
मानवता हाशिये पर है
नृशंसता हो गई दूनी।
युद्ध की लालसा ने किया
मानवता का भयंकर नाश
विकसित विश्व को किया पीछे
सदभावों का सर्वनाश ।
प्रतिफल क्या है युद्ध का ये
सिर्फ आग ,राख,लहू,क्रंदण
जब मानवता करती है
मनुष्य मात्र का चरण वंदन ।
अब जरा धैर्य रखो मनुष्य
युद्ध की चाहत को छोडो
मानवता की रक्षा करो
अहंकार से मुख मोडो ।
विद्या
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