सांय सांय करे सन्नाटा
नीरवता पसरी चहुंदिश
बिना किसी आबादी के
आवाज आ रही फुस फुस ।
उल्लु ,चमगादड,छुछुन्दर हैं
सांप,गिरगिट,मेंढक अनेक
भरे हैं इस वीरान में
लाइन में लगाते टेक ।
चीख का प्रतिरोध है ये
अनकही आवाज है
प्रचंड भयावहता इसमें
काल का ही ये साज है।
विजय नगर के खंडदर हों
हम्पी के पुराने खंडहर
समृद्धि की कथा कहते हैं
वर्तमान काल में आकर ।
कभी यहां हथशाला थी
हाथी झूमा करते थे
उधर बनाया था अस्तबल
ऊंचे घोडे रहते थे।
यहां लगाया करते थे
महाराज अपना दरबार
न्याय करते ऊंचे बैठ
जनता आ करती गुहार ।
सुमंगल गान भी गूंजता
भोरे सांझ प्रतिदिन ही
नर्तकियों का नर्तन होता
नृत्यशाला सजती मिलती ।
राजा,मंत्री,राजकुमार
रानियां, राजकुमारियां
दास ,दासियां,सेविका सब
भ्रमण करती थीं ज्यों परियां ।
झीना झीना सुगंध भरा
मदहोश करता था महल
अब ये एकान्त नीरवता
ढाह रहा है प्रलय कहर ।
सन ,सन ,सन,सन हवा चले
हू,हू,हू,हू शोर उठता
उदास हो कहता खंडहर
काल सबको छीज देता ।
विद्या
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