मैं कौन हूं किसकी हूं
क्या पहचान है मेरी
इसे ही समझने में कटी
बचपन की जिन्दगी मेरी।
अनजान लोक से कैसे
धरती पर अवतरित हुई
मां का दूध पिता का प्यार
पा पा कर मैं बडी हुई।
जाना मैंने परिचय नाम
समझ गई सब ताम झाम
स्कूल ,टीचर ,पुस्तक ,कौपी
पढना लिखना खेलना काम ।
किशोरावस्था जब आई
भावनाएं और बढ गईं
महत्व मेरा भी बढ गया
नई नई बातें समझ आईं।
सभा समाज की समझ तो
आ गई विशेष रूप से
कैसे बैठना, बोलना ,चलना
खाना पीना सोना सब ।
आकर ससुराल में सीखा
नई रस्म औ तौर तरीके
अनेक तरह के बंधन संग
निन्दा कल बल छल सरीखे ।
बनी मां बच्चों को पाला
पाल पोस कर बडा किया
दे दिया दूसरों को अब
जिम्मेदारी पूरा किया ।
फिर नानी दादी बन
छोटे बच्चों संग खेली
बढती उम्र सिखा गया अब
जीवन की अबूझ पहेली ।
नाती पोते बडे हुए तो
कुछ नहीं बचा करने को
याद करती ईश्वर नाम
दिन गिन रहती मरने को।
हर उम्रमें पहचान बदली
बचपन से आया बुढापा
काल ने क्षण क्षण बढाकर
दिखाया जीवन का स्यापा ।
विद्या
——////——////——////——////——////——////——////——////——-