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मेरी नानी ऐसी पर्सनलटी थीं जिन्होंने मेरे जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डाला है ।चूंकि पांच वर्ष की आयु में ही मैं मातृविहीन हो गई थी ।मेरे होश वाला बचपन नानी के सान्निध्य में ही बीता ।नई मम्मी के आने के पहले तक मैं उनके साथ थी ।अक्षर ज्ञान से लेकर भजन, प्रभाती ,रामचरितमानस,कल्याण जैसे ग्रन्थों से मेरा परिचय उन्होंने ही करवाया था जो आजतक मुझे याद है ।”शिकारी आयेगा जाल बिछायेगा दाना डालेगा लोभ से उसमें फंसना नहीं “एवं “बोया पेड बबूल का आम कहां ते होय”रानी रानी राजा बुझाव राजा नहीं बढई दंडे ,वढई नहीं खुट्टा चीरे ,खुट्टा में दाल वा का खाइव का पियव ,का लेके परदेश जाइव “जैसी कहानियां ही मेरी लोरी बनती थी ।बिना कहानी सुने नानी को सोने नहीं देती थी ।संयोग था कि मेरी नानी भी स्कूल में शिक्षिका थी मैं उन्ही के स्कूल में पढती थी बहुत दिनों तक तो गोद में चढ कर जाती थी बडी होने पर पैदल जाने लगी क्योंकि स्कूल नजदीक ही था ।एक और बात बताना चाहूंगी कि मुझे रात में उठ कर खाने की आदत थी इसीलिये नानी नेरे लिये रोटी में नमक तेल लगाकर लपेटकर रखती थी तो कभी खोवा रोटी ।मैं नानी के साथ अकेली रहती थी क्योकि मुझे मामा या मौसी नहीं थे सारा लाड दुलार मुझे ही मिलता था ।मेरा मन अध्यात्म में जो इतना रमता है उसकी नींव नानी ने ही डाली थी ।उन्होंने सिखाया था “चले चाल सादा निभे बाप दादा ।”उसी पर आज तक कायम हूं ।
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